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कागज पर बराबरी, जमीन पर भेदभाव: कानूनों की टकराहट में बेटियों का हक दबा

लखनऊ, 13 जनवरी (आईएएनएस)। लखनऊ विश्वविद्यालय के एक ताजा अध्ययन ने उत्तराधिकार कानूनों की उस सख्त हकीकत को उजागर किया है, जहां बेटियों को बराबरी का अधिकार देने की संवैधानिक बात तो होती है, लेकिन जमीनी सच्चाई आज भी भेदभाव से भरी है। रिपोर्ट बताती है कि केंद्र और राज्य के कानूनों में विरोधाभास के चलते बेटियां अब भी कृषि और पैतृक संपत्ति से वंचित हैं।
कागज पर बराबरी, जमीन पर भेदभाव: कानूनों की टकराहट में बेटियों का हक दबा

लखनऊ, 13 जनवरी (आईएएनएस)। लखनऊ विश्वविद्यालय के एक ताजा अध्ययन ने उत्तराधिकार कानूनों की उस सख्त हकीकत को उजागर किया है, जहां बेटियों को बराबरी का अधिकार देने की संवैधानिक बात तो होती है, लेकिन जमीनी सच्चाई आज भी भेदभाव से भरी है। रिपोर्ट बताती है कि केंद्र और राज्य के कानूनों में विरोधाभास के चलते बेटियां अब भी कृषि और पैतृक संपत्ति से वंचित हैं।

उत्तर प्रदेश शासन की रिसर्च एवं डेवलपमेंट योजना 2021-22 के तहत लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय द्वारा किए गए एक व्यापक अध्ययन ने बेटियों के उत्तराधिकार अधिकारों की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शोध में सामने आया है कि समान अधिकारों की संवैधानिक गारंटी और न्यायालयों के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद बेटियों को संपत्ति में हिस्सेदारी से दूर रखा जा रहा है।

'मिशन शक्ति के अंतर्गत बेटियों के कृषि एवं पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकार की स्थिति का विधिक मूल्यांकन' विषय पर तैयार इस शोध परियोजना के प्रधान अन्वेषक प्रो. राकेश कुमार सिंह के अनुसार, उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का निर्धारण उत्तर प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 2006 के तहत होता है। इस संहिता में केवल अविवाहित पुत्री को पिता की कृषि भूमि में अधिकार दिया गया है, जबकि विवाहिता पुत्री को स्वतः इस अधिकार से बाहर मान लिया जाता है।

रिपोर्ट इसे समानता के सिद्धांत के विरुद्ध बताते हुए कहती है कि यह व्यवस्था बेटियों को विवाह और अधिकार के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करती है। अध्ययन में इस तथ्य को भी रेखांकित किया गया है कि केंद्र का हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा भी इस अधिकार को पूरी मजबूती से स्थापित करता है। इसके बावजूद राज्य के भू-राजस्व कानून और केंद्र के उत्तराधिकार कानून के बीच मौजूद विरोधाभास व्यावहारिक स्तर पर असमानता और विवाद को जन्म दे रहा है।

रिपोर्ट में लखनऊ जिले की बक्शी का तालाब तहसील में कराए गए सर्वे के निष्कर्षों को बेहद चिंताजनक बताया गया है। सर्वे के अनुसार करीब 90 प्रतिशत बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिला, जबकि बड़ी संख्या में बेटियां अपने कानूनी अधिकारों से पूरी तरह अनजान पाई गईं। शोध में सरकार को कई अहम सुझाव भी दिए गए हैं। इनमें विवाह के समय ही विवाहिता पुत्री की संपत्ति में वास्तविक हिस्सेदारी तय करने, पति के परिवार में महिला को पति के समान अधिकार सुनिश्चित करने, बेटियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाने तथा पारिवारिक संपत्ति विवादों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष न्यायालयों के गठन की सिफारिश शामिल है।

रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि सामाजिक दबाव, पारंपरिक सोच और वसीयत जैसी प्रक्रियाओं के जरिये बेटियों को योजनाबद्ध तरीके से संपत्ति से दूर रखा जा रहा है। ऐसे में अध्ययन ने सरकार से कानूनों में आवश्यक संशोधन कर बेटियों को उत्तराधिकार में वास्तविक न्याय और समान अधिकार सुनिश्चित करने की जोरदार मांग की है।

--आईएएनएस

विकेटी/डीकेपी

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