जेएनयू-जामिया विवाद पर सीपीआई नेता गिरीश शर्मा का हमला, बोले- छात्रों को बदनाम करने की साजिश
नई दिल्ली, 25 अक्टूबर (आईएएनएस)। सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव गिरीश चंद्र शर्मा ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और जामिया की दीवारों पर लिखी बातों, छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों, जम्मू-कश्मीर पर फारूक अब्दुल्ला के बयान, 1 नवंबर को होने वाली 'इंडिया' गठबंधन की रैली और उस पर भाजपा के हमले को लेकर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर दी।
गिरीश चंद्र शर्मा ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान कहा, "जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन के बाद, भारत सरकार काफी घबरा गई है। सरकार को डर था कि जामिया में छात्र संघ की बहाली के लिए चल रहा छात्रों का आंदोलन, वोट की चोरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन से न जुड़ जाए। अगर ऐसा हो जाता, तो सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाती। इसलिए, जामिया प्रशासन पर दबाव डालकर सरकार ने इस आंदोलन को खराब करने की कोशिश की। हम जामिया और वहां के छात्रों को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। इस तरह के नारे लिखना एक साजिश का हिस्सा है। ये नारे एक साजिश के तहत लिखे गए थे और इन्हें लिखने वाले लोग भीड़ में बाहर से घुसाए गए थे।"
उन्होंने कहा कि ये सब भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय इशारे पर हो रहा है। विपक्ष पर आरोप लगाने के लिए एफआईआर दर्ज कराई गई है। यह आंदोलन काफी समय से चल रहा था, तब इस तरह के नारे नहीं लिखे गए। अचानक एक-दो दिनों में ऐसा क्या हो गया कि नारे लिखे गए और नारे लगाए भी गए। जांच के बाद ही सच्चाई का पता चल जाएगा।
शर्मा ने कहा कि मेरा मानना है कि निश्चित तौर पर यह केंद्रीय सरकार के दबाव में जामिया प्रशासन का षड्यंत्र है। छात्रों और आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश है। सरकार वोट चोरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन को कमजोर करना चाहती है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के पाकिस्तान और कश्मीर को लेकर दिए गए विवादित बयान को लेकर गिरीश चंद्र शर्मा ने कहा, "फारूक अब्दुल्ला वैसे तो एक बहुत जिम्मेदार नेता हैं और ऐसे परिवार से आते हैं जिसने स्वतंत्रता संग्राम में बड़ा योगदान दिया है, और कश्मीर को भारत के साथ जोड़े रखने में अहम भूमिका निभाई है। आज भी, उनकी पार्टी जम्मू-कश्मीर में एक बड़ी राजनीतिक ताकत है और सत्ता में है। अगर उनकी तरफ से ऐसा कोई बयान आया है, तो मुझे हैरानी होती है। मुझे लगता है कि या तो उनके बयान को समझने में कोई गलती हुई है, या फिर बोलते समय उनसे कोई चूक हो गई होगी। फारूक अब्दुल्ला को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि उनके असली विचार वही हैं जो इस बयान से झलकते हैं। जब से अनुच्छेद 370 हटाया गया है, तब से फारूक अब्दुल्ला, उनकी पार्टी और अन्य स्थानीय पार्टियां कश्मीर के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कर रही हैं।"
उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने राज्य का दर्जा देने का वादा किया था, वह मुकर रही है और देना भी नहीं चाहते हैं। इस मामले को लेकर कोई भी बयान निकल जाए तो भाजपा मुद्दा बना देती है। मुझे लगता है कि फारूक अब्दुल्ला के बयान को भी मुद्दा बनाया गया है। हालांकि फारूक अब्दुल्ला को अपने बयान पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।
1 नवंबर को होने वाली 'इंडिया' गठबंधन की रैली को लेकर भाजपा का आरोप है कि उस दिन सिख दंगे की बरसी है। इस दिन रैली करना सिखों के जख्मों पर नमक डालने जैसा है। इस पर गिरीश चंद्र शर्मा ने कहा कि भाजपा के पास कोई काम नहीं बचा है। विपक्ष की कोई बात हो, आंदोलन को लेकर पहले व्यापारियों को आगे किया गया। रामलीला मैदान में रैली होगी तो व्यापार पर उसका क्या असर पड़ेगा? लेकिन कौन नहीं जानता कि व्यापारी समुदाय के ज्यादातर लोग भाजपा समर्थक हुआ करते हैं।
उन्होंने कहा कि जब राजनीतिक पार्टियां रैली की तारीख तय करती हैं तो यह नहीं देखा करती कि उस दिन क्या-क्या हुआ था। तारीखें अपनी सुविधा और जगह की उपलब्धता को देखते हुए तय होती हैं। रामलीला चलने की वजह से रामलीला मैदान व्यस्त था, अब उपलब्ध हुआ है। इंडिया गठबंधन की बैठक में तय किया गया था कि देशभर में पांच रैलियां तय की जानी चाहिए। इनमें एक रैली दिल्ली में होनी चाहिए। इस दौरान प्रस्ताव आया कि पहली रैली दिल्ली में की जाए। सबकी सुविधा से एक नवंबर की तारीख तय की गई। सब तय होने के बाद पुलिस से अनुमति मांगी गई। परमिशन मिलने के बाद रैली की संभावित सफलता से भाजपा घबराई है।
--आईएएनएस
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