झारखंड में नदियों के रिवर बेड तक अतिक्रमण, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी- न संभले तो विकराल होगा जल संकट
धनबाद, 22 मार्च (आईएएनएस)। झारखंड के प्रमुख शहरों में नदियों के रिवर बेड तक अतिक्रमण और भूजल के अंधाधुंध दोहन के कारण जल संकट तेजी से गंभीर होता जा रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और विकराल हो सकती है।
विश्व जल दिवस के अवसर पर आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में रविवार को आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में वक्ताओं ने आंकड़े और तथ्य पेश करते हुए बताया कि रांची, धनबाद और जमशेदपुर जैसे शहरों में नदियों के भीतर तक निर्माण हो चुका है। इससे नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है और बाढ़ के दौरान नुकसान की आशंका बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अतिक्रमित जमीन को मुक्त कराए बिना नदियों को अविरल बनाए रखना संभव नहीं है। कार्यक्रम में जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और पिछले दो दशकों से दामोदर नदी बचाओ आंदोलन चलाने वाले सरयू राय ने कहा कि असीमित बोरिंग के कारण भूजल स्तर तेजी से गिरा है और जल संकट गहराता जा रहा है।
पद्मश्री प्रो. आरके सिन्हा ने तटबंध निर्माण के बदलते स्वरूप और नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताई। वहीं, आईआईटी (आईएसएम) के प्रो. अंशुमाली ने कहा कि वाटरशेड प्रबंधन की योजनाएं प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो पाई हैं, जिससे छोटी नदियां और जलधाराएं तेजी से खत्म हो रही हैं।
युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, भूजल के अत्यधिक दोहन और अनियंत्रित भूमि उपयोग से जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में पेयजल की मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर पैदा हो सकता है। सेमिनार में यह भी कहा गया कि औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के बढ़ते दबाव ने नदियों और जल स्रोतों की स्थिति को और खराब किया है।
कई वक्ताओं ने जोर दिया कि विकास योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता दिए बिना समस्या का समाधान संभव नहीं है। आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, युगांतर भारती, नमामि गंगे, केंद्रीय भूजल बोर्ड और अन्य संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सेमिनार में देशभर के विशेषज्ञों ने जल संरक्षण, नदियों के पुनर्जीवन और संसाधनों के संतुलित उपयोग पर जोर दिया।
--आईएएनएस
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