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झारखंड: सीजीएल परीक्षा रद्द होने के खिलाफ हंगामा जारी, अभ्यर्थी बोले- हमारी क्या गलती?

झारखंड: सीजीएल परीक्षा रद्द होने के खिलाफ हंगामा जारी, अभ्यर्थी बोले- हमारी क्या गलती?
झारखंड: सीजीएल परीक्षा रद्द होने के खिलाफ हंगामा जारी, अभ्यर्थी बोले- हमारी क्या गलती?

रांची, 21 अगस्त (आईएएनएस)। झारखंड सीजीएल परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले के खिलाफ प्रभावित अभ्यर्थियों और कर्मचारियों का विरोध-प्रदर्शन शुक्रवार को भी जारी रहा। प्रदर्शनकारी राज्य सचिवालय के बाहर जुटे और सरकार के फैसले के खिलाफ नाराजगी जताई। प्रदर्शन में ऐसे कई अभ्यर्थी और कर्मचारी भी शामिल रहे, जिन्हें परीक्षा में चयन के बाद विभिन्न सरकारी विभागों में नियुक्ति मिली थी। उनका कहना है कि उन्होंने वर्षों की मेहनत और संघर्ष के बाद यह मुकाम हासिल किया था, लेकिन परीक्षा रद्द होने के फैसले ने उन्हें एक झटके में फिर बेरोजगारी की स्थिति में ला दिया।

प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने और चयनित उम्मीदवारों को दोबारा नियुक्त करने की मांग की।

प्रदर्शन में शामिल जावेद अंसारी ने बताया कि उनका चयन एएसओ के पद पर हुआ था और उनकी पोस्टिंग पेयजल विभाग के नेपाल हाउस में थी। वर्षों की मेहनत के बाद मिली नौकरी को सरकार के एक फैसले ने उनसे छीन लिया और उन्हें एक दिन में सड़क पर आने की स्थिति में पहुंचा दिया। जावेद ने बताया कि वे दिव्यांग हैं और उनके लिए इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। 2003 में उनके पिता का निधन हो गया था और इसके बाद परिवार को चलाने की जिम्मेदारी भाइयों ने संभाली। ऐसे में लंबे समय तक परिवार पर निर्भर रहना भी उनके लिए संभव नहीं था।

उन्होंने कहा कि झारखंड की यह परीक्षा प्रक्रिया करीब एक दशक तक खिंचती रही। इसी उम्मीद में उन्होंने अपनी जिंदगी को सीमित संसाधनों में आगे बढ़ाया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर उनका कोई दोष है तो सरकार उन्हें उसका सबूत दे। यदि उन्होंने किसी तरह की गड़बड़ी की है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए, लेकिन बिना व्यक्तिगत गलती साबित किए उन्हें नौकरी से बाहर करना अन्याय है।

जावेद ने कहा कि सरकार ने जल्दबाजी में फैसला लिया है और अब वे न्याय के लिए हाईकोर्ट का रुख करेंगे। उन्हें उम्मीद है कि अदालत से उन्हें न्याय मिलेगा। यदि मेहनत और चयन के बाद भी इस तरह नौकरी चली जाएगी, तो झारखंड के युवाओं के बीच प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर भरोसा कैसे कायम रहेगा। वे खुद तो इस फैसले से प्रभावित हो चुके हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अगली पीढ़ी का है। जो युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, वे यह सोच सकते हैं कि जब वर्षों की मेहनत के बाद चयनित व्यक्ति को भी कुछ महीनों बाद नौकरी से बाहर किया जा सकता है, तो वे किस भरोसे से तैयारी करें।

ऋषिकेश रंजन ने अपनी संघर्ष की कहानी बताते हुए कहा कि उनका चयन एएसओ के पद पर हुआ था और वे फॉरेस्ट हेडक्वार्टर में कार्यरत थे। उन्होंने इससे पहले एसएससी सीजीएल के तहत जूनियर स्टैटिस्टिकल ऑफिसर (जेएसओ) का पद भी हासिल किया था, लेकिन सरकारी सेवा में आगे बढ़ने के इरादे से उन्होंने वहां से इस्तीफा दिया। उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय से पढ़ाई की और बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बीएससी और एमएससी की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने केंद्र सरकार की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया।

उन्होंने अपने संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि एक समय 99.83 पर्सेंटाइल हासिल करने के बावजूद वे टाइपिंग टेस्ट में असफल हो गए थे। उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार तैयारी जारी रखी। 2022 में उन्हें निजी क्षेत्र में नौकरी मिली, लेकिन उन्होंने उसे ज्वाइन नहीं किया क्योंकि उनका लक्ष्य सरकारी नौकरी हासिल करना था। बाद में उन्हें सीएचएसएल में भी नियुक्ति मिली, लेकिन उसी समय सीजीएल से भी पोस्टिंग मिलने के कारण उन्होंने वहां ज्वाइन नहीं किया। लेकिन अब परीक्षा रद्द होने के बाद वे खुद को एक बार फिर शून्य पर खड़ा पा रहे हैं।

उन्होंने सरकार के फैसले को दबाव में लिया गया निर्णय बताते हुए कहा कि अगर किसी परीक्षा में कुछ लोग गलत पाए जाते हैं तो उन लोगों की पहचान कर कार्रवाई की जानी चाहिए। पूरी परीक्षा और चयन प्रक्रिया को रद्द करना समाधान नहीं है। पूरे मामले के पीछे कोचिंग माफिया की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। अगर किसी को परीक्षा में गड़बड़ी मिली है तो सरकार पर दबाव बनाया जाना चाहिए था कि वह सीमित समय में जांच पूरी करे और दोषियों पर कार्रवाई करे। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर परीक्षा रद्द करने की मांग क्यों की गई और इससे उन अभ्यर्थियों का क्या होगा, जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा पास की है?

उन्होंने कहा कि किसी भी गलत तरीके से चयनित व्यक्ति के खिलाफ विभागीय जांच और आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन निर्दोष अभ्यर्थियों को भी उसी कार्रवाई की कीमत चुकानी पड़े, यह उचित नहीं है।

प्रमोद कुमार दास ने बताया कि वे धनबाद में सर्किल इंस्पेक्टर (सीआई) के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने कहा कि चयन के बाद उन्होंने अपनी पिछली नौकरी छोड़ दी थी, लेकिन अब परीक्षा रद्द होने के बाद वे फिर सड़क पर आ गए हैं। दास ने सरकार से मांग की कि प्रभावित अभ्यर्थियों को जल्द से जल्द दोबारा नियुक्त किया जाए।

प्रदर्शन में शामिल एक महिला अभ्यर्थी ने कहा कि सरकार ने दबाव में फैसला लिया और एक झटके में सभी को बाहर कर दिया गया। उन्हें न्याय चाहिए और उन्हें अदालत पर पूरा भरोसा है।

एक अन्य महिला अभ्यर्थी ने कहा कि उनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुई थी। उनका आरोप है कि सरकार ने भीड़ के दबाव में कैबिनेट की बैठक के बाद उन्हें बाहर करने का फैसला लिया। महिला ने सवाल उठाया कि आखिर उन्हें किस आधार पर बाहर किया गया। उन्होंने कहा कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, लेकिन सभी चयनित अभ्यर्थियों को इसका खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए।

प्रदर्शन में शामिल सुभम ने भी कोचिंग संस्थानों की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कोचिंग माफिया पर सरकार की पर्याप्त लगाम नहीं है और भीड़ जुटाकर सरकार पर दबाव बनाया गया, जिसके बाद परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया गया।

--आईएएनएस

पीएसके/एबीएम

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