जम्मू-कश्मीर : सीएफसी से बदल रही कारीगरों की जिंदगी, बांस उद्योग को मिल रही नई पहचान
सांबा, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। परंपरा और आधुनिकता का अनोखा संगम इन दिनों जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले के जलापर गांव में देखने को मिल रहा है। यह गांव उन करीब ढाई सौ परिवारों का घर है, जो पीढ़ियों से बांस के काम से जुड़े हुए हैं। समय बदलने के बावजूद इन लोगों ने अपने पुश्तैनी हुनर को न सिर्फ जिंदा रखा है, बल्कि अब उसे नई तकनीक के साथ और आगे बढ़ा रहे हैं।
इसी कड़ी में सरकार ने जलापर गांव में बांस से जुड़े कारीगरों के लिए एक कॉमन फैसिलिटी सेंटर (सीएफसी) की स्थापना की है। करोड़ों रुपए की लागत से बनाए गए इस सेंटर का मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर में बांस शिल्प को बढ़ावा देना और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है।
इस सेंटर में रोजाना बड़ी संख्या में युवक-युवतियां, पुरुष और महिलाएं प्रशिक्षण लेने पहुंचते हैं। यहां उन्हें बांस से बनने वाले विभिन्न उत्पादों जैसे आभूषण, गृह सज्जा की वस्तुएं, फर्नीचर और अन्य कई उपयोगी चीजें बनाना सिखाया जाता है। खास बात यह है कि इस सेंटर में अत्याधुनिक मशीनें भी लगाई गई हैं, जिससे काम पहले के मुकाबले काफी आसान और तेज हो गया है।
सेंटर में बांस के ट्रीटमेंट और प्रोसेसिंग के लिए कई एडवांस मशीनें मौजूद हैं, जिनमें बांस स्प्लिटिंग मशीन, क्रॉस कटिंग मशीन और बांस स्लाइसिंग मशीन शामिल हैं। इन मशीनों की मदद से जो काम पहले हाथों से करने में काफी समय लगता था, अब वह बहुत कम समय में पूरा हो जाता है।
प्रशिक्षुओं का कहना है कि इस सेंटर के खुलने से उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। एक प्रशिक्षु ने बताया कि पहले जो काम एक दिन में होता था, अब वह एक घंटे में पूरा हो जाता है। साथ ही, अब वे पहले से ज्यादा आधुनिक और आकर्षक उत्पाद भी बना पा रहे हैं।
प्रशिक्षु मंजित सिंह ने आईएएनएस से कहा कि उनका यह काम उनके पूर्वजों के समय से चला आ रहा है। उन्हें विभाग की ओर से असम भेजा गया था, जहां उन्होंने प्रशिक्षण लिया। अब जलापर में भी उसी तरह की आधुनिक मशीनें उपलब्ध हैं, जिससे उनका काम आसान हो गया है।
वहीं, राजेंद्र कुमार ने बताया कि उनका पूरा परिवार बांस के काम से ही जुड़ा है और इसी से उनका जीवन यापन होता है। उन्होंने कहा कि सीएफसी के आने से उनका काम पहले से ज्यादा आसान और बेहतर हो गया है।
शेफाली देवी ने कहा कि उनके बुजुर्ग भी यही काम करते थे और अब वे भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। उन्होंने बताया कि कुछ युवा असम जाकर ट्रेनिंग लेकर आए और अब वे यहां बाकी लोगों को भी प्रशिक्षण दे रहे हैं। उनके मुताबिक, जो काम पहले पांच दिन में होता था, अब एक दिन में पूरा हो जाता है।
प्रीति देवी ने भी कहा कि इस सेंटर से उन्हें बहुत कुछ नया सीखने को मिला है। उन्होंने बताया कि अब वे बांस से कई तरह के नए उत्पाद बना रही हैं और मशीनों की मदद से काम काफी तेज हो गया है।
हैंडिक्राफ्ट विभाग के असिस्टेंट डायरेक्टर एक्शु शर्मा ने बताया कि इस कॉमन फैसिलिटी सेंटर का उद्देश्य स्थानीय कारीगरों को एक ऐसा मंच देना है, जहां वे अपने कौशल को और निखार सकें और बेहतर आजीविका हासिल कर सकें। उन्होंने बताया कि इसके लिए असम के एनईसी बीडीसी के साथ एक एमओयू भी साइन किया गया था, जिसके तहत यहां अत्याधुनिक मशीनें स्थापित की गई हैं।
उन्होंने कहा कि इस सेंटर में बड़ी संख्या में युवा काम कर रहे हैं और विभाग की कोशिश है कि बांस से बने उत्पादों को एक नई पहचान मिले और इसे बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा सके।
--आईएएनएस
वीकेयू/पीएम

