जब लड़की होकर फौज में जाने के सपने पर हंसते थे लोग, पद्मा बंदोपाध्याय ने ऐसे रचा इतिहास
नई दिल्ली, 3 नवंबर (आईएएनएस)। जब भी देश की रक्षा और सेना में महिलाओं की भागीदारी की बात होती है, तो कुछ ऐसी महिलाओं का नाम जरूर सामने आता है, जिन्होंने अपने हौसले और मेहनत से पुरानी सोच को बदलने का काम किया। ऐसी ही एक शख्सियत हैं डॉ. पद्मा बंदोपाध्याय। एक ऐसा दौर था, जब लड़कियों के लिए सेना में जाने का सपना देखना भी लोगों को अजीब लगता था। जब पद्मा ने फौज में शामिल होने की इच्छा जताई, तो लोग उन पर हंसते थे लेकिन पद्मा ने लोगों की बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने न सिर्फ भारतीय वायुसेना में अपनी अलग पहचान बनाई, बल्कि देश की पहली महिला एयर वाइस मार्शल बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा दिया।
डॉ. पद्मा बंदोपाध्याय का जन्म 4 नवंबर 1944 को आंध्र प्रदेश के तिरुपति में एक तमिल भाषी अय्यर परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका जीवन आसान नहीं रहा। जब वह महज चार-पांच साल की थीं, तब उनकी मां टीबी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गईं। छोटी-सी उम्र में ही पद्मा ने मां की देखभाल की जिम्मेदारी संभाल ली थी।
पद्मा की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। आगे चलकर उन्होंने किरोड़ीमल कॉलेज से प्री-मेडिकल की पढ़ाई की। हालांकि, यहां तक पहुंचने का रास्ता भी उनके लिए आसान नहीं था। वह उम्र कम होने की वजह से कई कॉलेजों में दाखिला नहीं ले पा रही थीं। ऐसे में उनके पिता ने उनका पूरा साथ दिया। वह कई कॉलेजों के चक्कर लगाते रहे और अधिकारियों से बेटी को मौका देने की गुहार लगाते रहे। आखिरकार किरोड़ीमल कॉलेज में उन्हें दाखिला मिल गया।
पद्मा का सपना कभी आईएएस अधिकारी बनने का भी था। लेकिन साल 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान उनके आसपास के माहौल ने उनकी सोच बदल दी। उनके एक पुराने इंटरव्यू के मुताबिक, गोल मार्केट के आसपास रहने वाले उनके परिवार और परिचितों के बीच युद्ध का गहरा असर देखने को मिला था। उस दौरान कई घरों के लोग देश के लिए शहीद हो गए थे। इस घटना ने पद्मा के मन पर गहरी छाप छोड़ी। अब उनका लक्ष्य आईएएस बनना नहीं, बल्कि देश के लिए कुछ करना था।
वह सेना में जाना चाहती थीं, लेकिन उस दौर में लड़कियों के लिए यह रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था। जब भी वह किसी से कहतीं कि उन्हें फौज में भर्ती होना है, तो लोग हंसने लगते थे। कई लोग तो यह तक कहते थे कि लड़की होकर सेना में कैसे जाओगी लेकिन पद्मा ने किसी की बातों की परवाह नहीं की। साल 1963 में उन्होंने पुणे के आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। यहां भी उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। आखिरकार पांच साल की मेडिकल पढ़ाई पूरी करने के बाद 1968 में वह भारतीय वायुसेना में शामिल हो गईं।
पद्मा के सामने सेना, नौसेना और वायुसेना में से किसी एक को चुनने का विकल्प था। उन्होंने अपनी पसंद से भारतीय वायुसेना को चुना। शुरुआत में वह डॉक्टर के तौर पर सेना में शामिल हुई थीं लेकिन उनका रोमांच और सीखने की इच्छा यहीं तक सीमित नहीं थी। वह विमानन चिकित्सा के क्षेत्र में आगे बढ़ीं और पायलटों के साथ उड़ान भरने का अनुभव भी हासिल किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात विंग कमांडर एसएन बंदोपाध्याय से हुई, जिनसे उन्होंने शादी की। दोनों ने भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं दीं।
साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पद्मा पंजाब बॉर्डर पर तैनात थीं। उस समय उनके पति भी वहीं अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उस समय वह वहां अकेली महिला अधिकारी थीं और उनका बच्चा महज छह-सात महीने का था। युद्ध के दौरान उन्हें बंकरों में रहना पड़ता था और हर समय मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों से कभी मुंह नहीं मोड़ा। युद्ध के दौरान उनकी सेवाओं के लिए उन्हें विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया।
पद्मा बंदोपाध्याय की उपलब्धियों की सूची काफी लंबी है। वह 1978 में डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज का कोर्स पूरा करने वाली पहली महिला अधिकारी बनीं। इसके अलावा वह उत्तरी ध्रुव पर वैज्ञानिक शोध करने वाली पहली भारतीय महिला भी हैं। उन्होंने भारतीय एयरोस्पेस मेडिकल सोसाइटी में भी अहम योगदान दिया। ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात सैनिकों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किए। हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा और हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा जैसी गंभीर समस्याओं से बचाव के उपाय विकसित करने में भी उनकी भूमिका रही।
साल 2002 में वह एयर वाइस मार्शल के पद पर पदोन्नत होने वाली भारतीय वायुसेना की पहली महिला अधिकारी बनीं। आगे चलकर वह भारतीय वायुसेना की पहली महिला एयर मार्शल भी बनीं। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें अति विशिष्ट सेवा पदक और परम विशिष्ट सेवा पदक जैसे सम्मान मिले। साल 2020 में चिकित्सा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया।
पद्मा बंदोपाध्याय का मानना था कि सेना में शामिल होना केवल रोमांच या वर्दी पहनने का शौक नहीं है। इसके लिए मानसिक मजबूती, अनुशासन और हर परिस्थिति का सामना करने का जज्बा होना जरूरी है। उनका कहना था कि सेना में महिलाओं को भी मुश्किल हालात का सामना एक आम सैनिक की तरह करना पड़ता है। महिला होने के नाम पर जिम्मेदारियों से बचा नहीं जा सकता।
--आईएएनएस
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