जब कुछ लोग मोबाइल में 'आग कैद' कर रहे थे, तब एक शख्स 'आग के भीतर जिंदगी' तलाश रहा था
लखनऊ, 23 जून (आईएएनएस)। लखनऊ के भीषण अग्निकांड में उठता धुआं एक इमारत के साथ समाज के दो अलग-अलग चेहरों को भी सामने ला रहा था। एक तरफ अफरातफरी के बीच मोबाइल कैमरे सक्रिय थे, लोग भय और कौतूहल के साथ घटनास्थल को देख रहे थे, वहीं दूसरी ओर राजभवन में तैनात राज्यपाल के पीएसओ समरवीर चाहर उन मासूम बच्चों की चीखें सुन रहे थे, जो जलती हुई इमारत के भीतर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे।
जब अधिकांश लोग फायर ब्रिगेड और राहत दल के पहुंचने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब समरवीर ने यह नहीं सोचा कि भीतर कितना खतरा है, धुआं कितना घना है या उनका अपना जीवन कितना सुरक्षित रहेगा। उन्होंने केवल इतना सोचा कि अगर देर हुई तो कुछ जिंदगियां हमेशा के लिए बुझ सकती हैं।
इसके बाद जो हुआ, वह केवल बहादुरी का नहीं बल्कि मानवता का असाधारण उदाहरण बन गया। पहले छत के रास्ते अंदर पहुंचने की कोशिश, फिर कोई खिड़की या सुरक्षित मार्ग न मिलने पर दीवार तोड़कर भीतर प्रवेश करना, धुएं और दहशत से भरे कमरों में बाथरूम में छिपे डरे-सहमे बच्चों को ढूंढना और उन्हें भरोसा दिलाकर सुरक्षित बाहर निकालना। मौत की परछाइयों के बीच समरवीर चाहर ने छह मासूम जिंदगियों को नया जीवन दिया।
यह एक साहसिक बचाव अभियान की कहानी नहीं है। यह उस दौर का आईना भी है, जहां कई बार संवेदनाएं कैमरों के पीछे छूट जाती हैं और मदद के हाथ आगे बढ़ने से पहले तमाशा देखने वाली भीड़ इकट्ठा हो जाती है। ऐसे समय में समरवीर चाहर जैसे लोग यह भरोसा जगाते हैं कि इंसानियत अभी जिंदा है, कर्तव्य अभी जिंदा है और संकट की सबसे अंधेरी घड़ी में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी सुरक्षा से पहले दूसरों की जिंदगी को महत्व देते हैं।
लखनऊ अग्निकांड की यह त्रासदी अनेक परिवारों को जीवन भर का दर्द दे गई, लेकिन इसी त्रासदी के बीच समरवीर चाहर की कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह भी सिखाएगी कि विपत्ति के समय असली पहचान पद, वर्दी या शक्ति से नहीं, बल्कि उस साहस और संवेदना से होती है जो किसी अनजान की जिंदगी बचाने के लिए स्वयं को जोखिम में डाल दे।
--आईएएनएस
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