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जब इंदिरा गांधी के खिलाफ कांग्रेस में खड़ा हुआ एक धड़ा, बदल गया था राजनीति का रुख

जब इंदिरा गांधी के खिलाफ कांग्रेस में खड़ा हुआ एक धड़ा, बदल गया था राजनीति का रुख
जब इंदिरा गांधी के खिलाफ कांग्रेस में खड़ा हुआ एक धड़ा, बदल गया था राजनीति का रुख

नई दिल्ली, 30 अक्टूबर (आईएएनएस)। जब इंदिरा गांधी कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग के लिए दुर्गापुर जाने के लिए कलकत्ता पहुंचीं, तो पार्टी के एक बड़े नेता के करीबी माने जाने वाले एक पत्रकार ने अपना माइक इंदिरा गांधी के सामने रखकर पार्टी के बड़े नेताओं के बारे में पूछा तो इंदिरा गांधी ने बिना चाल समझे बड़ी मासूमियत से कहा कि इन लोगों को अब पंडित नेहरू की पॉलिटिक्स पर भरोसा नहीं रहा। कुछ घंटों बाद जब दुर्गापुर में वर्किंग कमेटी की मीटिंग हुई, तो वही टेप कई बड़े नेताओं के हाथ में था।

8 फरवरी, 1916 को जन्मीं इंदिरा गांधी पर इन नेताओं ने पार्टी नेताओं के खिलाफ प्रोपेगैंडा फैलाने का आरोप लगाया और सुझाव दिया कि इंदिरा गांधी को सार्वजनिक तौर पर बोलने से रोक देना चाहिए। इस मीटिंग में इस झगड़े पर कोई नतीजा नहीं निकला, लेकिन इसके बाद इन नेताओं ने देखा कि इंदिरा गांधी जहां भी जातीं, उनके साथ लोगों की भारी भीड़ होती और ये नेता अकेले रह जाते। कन्वेंशन के खुले सेशन में दूसरे लोगों ने भी भाषण दिए, लेकिन उनके भाषण के दौरान लोग इंदिरा गांधी को भाषण देने के लिए बुलाने लगे और इसके लिए जोर-जोर से नारे लगाने लगे। आखिर में इंदिरा गांधी को बोलने के लिए बुलाया गया और जैसे ही वह माइक के सामने आईं, एकदम सन्नाटा छा गया।

लोगों ने उन्हें बड़े सब्र और शांति से सुना। जैसे ही उनका भाषण खत्म हुआ, लोग पंडाल से जाने लगे। इस घटना के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ डिसिप्लिनरी एक्शन लेने की बात छोड़ दी गई। इंदिरा गांधी को गद्दी सौंपने के फैसले का समर्थन करते हुए राज्य के बड़े नेताओं ने सोचा कि लोगों के बीच उनकी जबरदस्त लोकप्रियता की वजह से उन्हें वोट मिलेंगे और जैसे ही बागडोर उनके हाथ में आएगी, वे इंदिरा गांधी का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करेंगे या उन्हें पार्टी से निकाल देंगे।

1967 के चुनावों में लोगों ने न तो इंदिरा के पक्ष में वोट दिया और न ही उनके खिलाफ। लोगों ने इन बड़े नेताओं की राजनीति के खिलाफ फैसला दिया। असल में इंदिरा गांधी उन लोगों को टिकट नहीं दिला पाईं जिन्हें वे चाहती थीं। कृष्ण मेनन ऐसे ही लोगों में से एक थे। हालांकि उन्हीं वजहों से जिनके लिए ये लोग पंडित नेहरू के आसपास घूमते थे, उन्होंने मेनन के तैयार किए गए चुनाव मैनिफेस्टो को भी मना कर दिया।

सच तो यह था कि हर राज्य में बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी और इन लोगों ने क्षेत्रीय पार्टियां बनाकर विपक्ष के तौर पर खुद को शामिल कर लिया था। इसका नतीजा क्या हुआ, यह सब जानते हैं। इसकी वजह से केंद्र में कांग्रेस की ताकत कम हो गई और कांग्रेस को केरल, पश्चिम बंगाल और यहां तक कि पंजाब में भी सत्ता खोनी पड़ी।

यह बिल्कुल साफ था कि जनमत इन बड़े नेताओं के खिलाफ था। पार्टी में इन सभी बड़े नेताओं का रुतबा खत्म हो गया था और उनका दबदबा भी टूट चुका था। इसके बावजूद इन लोगों ने अपनी हार नहीं मानी। उनकी प्लानिंग जारी रहीं और उन्होंने इंदिरा गांधी को रास्ते से हटाने की चालें चलनी शुरू कर दीं। एक और बात यह हुई कि फरीदाबाद अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष ने खुद इस बात पर आपत्ति जताई कि सार्वजनिक क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार कर लिया गया है। जब मौका मिला तो राष्ट्रपति भवन को भी उनके खिलाफ साजिश का अड्डा बना दिया गया।

यहां तक कि प्रधानमंत्री के पद को भी कमतर दिखाने की कोशिश की गई, ताकि इन नेताओं का अहंकार बना रहे, भले ही वे चुनाव हार चुके थे। इन सबके बावजूद इंदिरा गांधी डटकर खड़ी हुईं और इन प्रतिक्रियावादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जब ​​कांग्रेसी नेताओं को यह समझ आया कि वोट सिर्फ इंदिरा के जरिए ही मिल सकते हैं, तो उन्होंने अपने आकाओं का साथ छोड़ दिया और उनके साथ हो लिए।

नतीजतन, 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया, लेकिन इन नेताओं ने अपने जैसे और लोगों को खोज निकाला और एक साझा मंच तैयार कर लिया। इन लोगों ने कांग्रेस की संगठनात्मक व्यवस्था का पूरा फायदा उठाया। वे कांग्रेसी नेता, जो अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते या अपने आकाओं की चालों में फंसकर 1967 के चुनावों के ठीक पहले या बाद में पार्टी छोड़कर चले गए थे, वे वापस पार्टी में लौट आए। वे लोग जिन्होंने नेहरू की विरासत के विरोध में पार्टी छोड़ी थी और उस साझा मंच से जुड़ गए थे, वे इसमें शामिल नहीं हुए।

1971 में इस साझा मंच को करारी हार का सामना करना पड़ा। विभाजन के कारण कांग्रेस संगठन बिखर गया था, लेकिन देशभर से लोग बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों पर पहुंचे और कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में वोट दिया। आजादी के बाद किसी नेता के लिए जनसमर्थन और उत्साह का ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा गया था। हर राज्य में कांग्रेस के पक्ष में भारी उत्साह था। कुछ राज्यों में इंदिरा कांग्रेस को अप्रत्याशित जीत मिली।

विधानसभा चुनावों में भी जनता का यही रुख देखने को मिला। तमिलनाडु को छोड़कर कांग्रेस ने वे सभी राज्य वापस पा लिए जो उसने खो दिए थे। कांग्रेस को उन राज्यों में सबसे अधिक सफलता मिली, जहां अविभाजित कांग्रेस के बड़े नेता सत्ता में थे। जनता ने स्पष्ट रूप से अपना फैसला सुना दिया कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ही असली कांग्रेस है।

लोगों ने इंदिरा गांधी में अपना अटूट विश्वास जताया और उन सभी नेताओं के राजनीतिक करियर पर पूर्ण विराम लगा दिया, जिन्होंने 1969 के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया था। इस जनादेश के माध्यम से, इंदिरा गांधी ने संकट की उस घड़ी में देश को बहुत ही समझदारी और चतुराई से संभाला, जब पाकिस्तान ने उपमहाद्वीप के पूर्वी हिस्से में भीषण नरसंहार मचा रखा था।

इन घटनाक्रमों का कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट पर साहस और संघर्ष की अमर गाथा: इंदिरा गांधी में जिक्र मिलता है।

इंदिरा गांधी भारत की तीसरी प्रधानमंत्री थीं और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री हैं। 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में चरमपंथियों ने कब्जा कर लिया, जो सिखों के लिए एक स्वतंत्र राज्य की मांग कर रहे थे। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए गांधी ने सेना भेजी, लेकिन इसके परिणामस्वरूप खून-खराबा हुआ, जिससे सिख समुदाय आहत हुआ। 31 अक्टूबर 1984 को गांधी की उनके घर के बाहर उनके ही दो अंगरक्षकों ने हत्या कर दी। उन्होंने स्वर्ण मंदिर में हुई घटना का बदला लेने के लिए ऐसा किया था।

--आईएएनएस

डीसीएच/

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