'इसीलिए तो रची गई थी सृष्टि...' जीवन के संघर्षों को सुरों में पिरोने वाले कवि दिनेश कुमार शुक्ल
नई दिल्ली, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। 'कहना सुनना और समझ पाना संभव हो, इसीलिये तो रची गई थी सृष्टि...' कवि दिनेश कुमार शुक्ल की 'कभी तो खुलें कपाट' कविता की पंक्तियां हैं, जिसमें जीवन के द्वंद्व से उत्पन्न आलाप को उन्होंने बखूबी सुरों में पिरोया है। दिनेश कुमार शुक्ल उन कवियों में हैं, जिनकी कविता पढ़ते हुए लगता है कि कोई हमसे सीधे बात कर रहा है। न भारी-भरकम शब्दों का बोझ, न बनावटी भाव, बस जिंदगी जैसी है, वैसी ही। उनकी कविताओं में खेत-खलिहान भी हैं, शहर की भागदौड़ भी, रिश्तों की गर्माहट भी और मन के भीतर का अकेलापन भी।
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के नर्वल गांव में 8 अप्रैल 1950 को जन्मे दिनेश कुमार शुक्ल का जीवन सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने विज्ञान की पढ़ाई की, एम.एस.सी. और डी.फिल. जैसी डिग्रियां हासिल कीं लेकिन दिल हमेशा शब्दों में धड़कता रहा। यही वजह है कि उनकी कविता में एक अलग तरह की संतुलित सोच दिखाई देती है, जहां भावनाएं भी हैं और तर्क भी।
उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे कठिन बातों को भी बहुत आसान तरीके से कह देते हैं। जैसे कोई बुजुर्ग बैठकर जीवन का अनुभव सुना रहा हो। उनकी कविताओं में जीवन का द्वंद्व बार-बार सामने आता है, जिसे वे रोजमर्रा की जिंदगी के हिस्से की तरह प्रस्तुत करते हैं।
दिनेश कुमार शुक्ल की कविता का एक और खास पहलू है लोक और परंपरा का इस्तेमाल। वे सिर्फ आधुनिकता की बात नहीं करते, बल्कि पुराने लोक रूपों, छंदों और परंपराओं को भी अपनी रचनाओं में जगह देते हैं। यही वजह है कि उनकी कविताएं पढ़ते हुए एक अपनापन महसूस होता है, जैसे यह सब पहले भी कहीं सुना या जिया हुआ है।
उनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियों समय चक्र, कभी तो खुलें कपाट, नया अनहद, कथा कहो कविता, ललमुनियां की दुनिया, आखर-अरथ, समुद्र में नदी और एक पेड़ छतनार में यह विविधता साफ दिखाई देती है। हर संग्रह में जीवन का एक नया रंग है, एक नया सवाल है और कहीं न कहीं उसी में छीपा हुआ कोई सरल-सा जवाब भी है। उन्होंने सिर्फ मौलिक लेखन ही नहीं किया, बल्कि विश्व प्रसिद्ध कवि पाब्लो नेरुदा की कविताओं का काव्यानुवाद भी किया।
उनकी कविता में मनुष्य केंद्र में है। वह आम आदमी की परेशानियां, उसकी छोटी-छोटी खुशियां, उसका संघर्ष सब कुछ बड़ी ही सहजता के साथ अपनी कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत करते थे। वे कविता को किसी ऊंचे मंच से नहीं, बल्कि जमीन से जोड़ते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएं सिर्फ साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि पाठकों के दिल तक पहुंचती हैं।
उनकी भाषा की सबसे बड़ी ताकत है उसकी बोलचाल वाली सहजता। ऐसा नहीं लगता कि हम कोई कविता पढ़ रहे हैं, बल्कि लगता है जैसे कोई हमारी ही कहानी हमें सुना रहा है। और शायद यही वजह है कि उनकी पंक्तियां याद रह जाती हैं। दिनेश कुमार शुक्ल को केदार सम्मान और सीता स्मृति सम्मान जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
--आईएएनएस
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