Samachar Nama
×

ईरान से समझौते की खबरों के बीच इराकी पीएम को व्हाइट हाउस का न्योता, क्या है वजह?

वाशिंगटन, 16 जून (आईएएनएस)। ईरान के साथ संघर्ष को विराम देने को लेकर इ-हस्ताक्षर हो गए हैं। 19 जून को जिनेवा में इस पर मुहर लगेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीस डील की जानकारी दी थी। इसके कुछ घंटों बाद ही इराक को व्हाइट हाउस ने अपने यहां आने का न्योता दिया गया। यूएस-इराक की ओर से एक संयुक्त बयान जारी कर बताया गया कि इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी जल्द अमेरिका जाएंगे। इसमें दावा किया गया है कि ट्रंप इराकी पीएम का स्वागत करने को उत्सुक हैं।
ईरान से समझौते की खबरों के बीच इराकी पीएम को व्हाइट हाउस का न्योता, क्या है वजह?

वाशिंगटन, 16 जून (आईएएनएस)। ईरान के साथ संघर्ष को विराम देने को लेकर इ-हस्ताक्षर हो गए हैं। 19 जून को जिनेवा में इस पर मुहर लगेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीस डील की जानकारी दी थी। इसके कुछ घंटों बाद ही इराक को व्हाइट हाउस ने अपने यहां आने का न्योता दिया गया। यूएस-इराक की ओर से एक संयुक्त बयान जारी कर बताया गया कि इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी जल्द अमेरिका जाएंगे। इसमें दावा किया गया है कि ट्रंप इराकी पीएम का स्वागत करने को उत्सुक हैं।

आखिर व्हाइट हाउस की ओर से भेजे न्योते की वजह क्या है? दरअसल, इराक की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति उसे मध्य पूर्व के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण स्थलों में से एक बनाती है। यही वजह है कि जब भी ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव या टकराव होता है, उसका सबसे सीधा और तेज असर इराक पर दिखाई देता है। हालिया संघर्ष में भी ऐसा ही कुछ दिखा।

इराक को अक्सर “बीच का देश” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह एशिया, अफ्रीका और यूरोप के चौराहे पर स्थित है। वहीं ईरान और अमेरिका जैसे दो बड़े प्रभाव क्षेत्रों के बीच की कड़ी भी है। एक तरफ ईरान है, जिसका इराक के अंदर राजनीतिक, धार्मिक और सुरक्षा ढांचे पर काफी प्रभाव माना जाता है, खासकर कुछ सशस्त्र समूहों और राजनीतिक गुटों के माध्यम से। दूसरी तरफ अमेरिका है, जिसकी इराक में सैन्य उपस्थिति रही है और जो लंबे समय से वहां की सरकार, सुरक्षा व्यवस्था और आर्थिक पुनर्निर्माण में साझेदार रहा है।

इस दोहरे प्रभाव की वजह से इराक एक ऐसा देश बन जाता है जहां दो अलग-अलग ताकतें एक ही समय पर मौजूद रहती हैं। यही स्थिति इसे “बैलेंसिंग ज़ोन” या संतुलन का केंद्र बना देती है। जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है, तो इराक अक्सर एक तरह से संघर्ष का अप्रत्यक्ष मैदान बन जाता है, जहां राजनीतिक दबाव, सुरक्षा घटनाएं और मिलिशिया गतिविधियां बढ़ सकती हैं। वहीं, जब दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है या किसी समझौते की दिशा बनती है, तो इराक को भी उस नए संतुलन में ढलना पड़ता है।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इराक के अंदर कई ऐसे सशस्त्र समूह सक्रिय हैं जो अलग-अलग बाहरी प्रभावों से जुड़े हुए माने जाते हैं। कुछ समूह ईरान के करीब माने जाते हैं, जबकि इराक सरकार अमेरिका के साथ सुरक्षा और आर्थिक सहयोग बनाए रखती है। इस वजह से इराक की नीति हमेशा संतुलन बनाने की कोशिश करती है ताकि वह किसी एक पक्ष के पूरी तरह प्रभाव में न चला जाए।

जब ईरान-अमेरिका के बीच तनाव कम होता है, तो इराक पर यह दबाव बढ़ जाता है कि वह अपने देश के अंदर मौजूद गैर-सरकारी हथियारबंद समूहों को नियंत्रित करे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह अपेक्षा बनती है कि इराक अपनी संप्रभुता को मजबूत करे और हथियारों पर केवल राज्य का नियंत्रण स्थापित करे। इसका मतलब यह है कि शांति की प्रक्रिया में इराक को केवल दर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय भागीदार बनना पड़ता है।

इसके अलावा, इराक की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र भी इस संतुलन से जुड़े हुए हैं। अमेरिका और पश्चिमी कंपनियों के निवेश, तेल और गैस परियोजनाएं, और बुनियादी ढांचे के विकास की योजनाएं इराक को एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार बनाती हैं। दूसरी तरफ, क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ईरान का प्रभाव भी एक वास्तविकता है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जैसा कि प्रधानमंत्री जैदी और अमेरिका के विशेष राष्ट्रपति दूत टॉम बैरेक ने 15 जून की अपनी बैठक में इस बात को दोहराया कि अमेरिकी सरकार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, और इराक सरकार, प्रधानमंत्री अल-जैदी के नेतृत्व में, एक मजबूत और पारस्परिक रूप से लाभकारी अमेरिका-इराक साझेदारी के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह साझेदारी इराक के एक संप्रभु, सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की आकांक्षाओं को पूरा करने के साथ-साथ दोनों देशों के लोगों को ठोस लाभ देने में सक्षम होगी।

साझा बयान में दोनों ने इराक के लिए एक ऐसे भविष्य पर चर्चा की जो आतंकवाद से मुक्त हो। इसमें यह सुनिश्चित करने की बात भी शामिल थी कि इराक में सक्रिय सभी गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों और संगठनों को पूरी तरह हथियारमुक्त किया जाए और उन्हें भंग किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि हथियार केवल राज्य के नियंत्रण में रहें और इराक अपनी पूर्ण संप्रभुता स्थापित कर सके, ताकि उसका क्षेत्र किसी भी पक्ष द्वारा क्षेत्रीय शांति को खतरे में डालने के लिए इस्तेमाल न हो सके। दोनों पक्षों ने इन प्रयासों को जल्द से जल्द पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

खुद राजदूत टॉम बैरेक ने इस बयान को साझा करते हुए एक्स पर लिखा- राष्ट्रपति ट्रंप की मध्य पूर्व रणनीति में जुड़ा एक और ऐतिहासिक अध्याय!

इस तरह, इराक केवल एक भौगोलिक “बीच का देश” नहीं है, बल्कि वह एक राजनीतिक और रणनीतिक पुल है। इसलिए जब ईरान और अमेरिका अपने संबंधों में सुधार या शांति की दिशा में बढ़ते हैं, तो इराक को भी उसी नए क्षेत्रीय ढांचे में शामिल होना पड़ता है, ताकि पूरे मध्य पूर्व में स्थिरता और संतुलन कायम रह सके।

--आईएएनएस

केआर/

Share this story

Tags