ईरान को अमेरिका पर भरोसा कम! बाघेई ने याद दिलाया इतिहास, बोले- 'लंबा रास्ता तय करना होगा'
तेहरान, 15 जून (आईएएनएस)। अमेरिका-ईरान शांति समझौता जिनेवा में 19 जून को संपन्न होगा। समझौते का ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कर चुके हैं, मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ संसद में बोल चुके हैं तो ईरान ने भी पहली प्रतिक्रिया स्वरूप एमओयू को लेकर सकारात्मक बयान दिया। हालांकि ईरान अभी भी अमेरिका को लेकर आश्वस्त नहीं है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने प्रेस ब्रीफिंग में स्पष्ट कहा कि रास्ता लंबा है। उन्होंने दशकों पुराना इतिहास भी याद दिलाया।
बाघेई ने कहा कि अमेरिका के साथ भरोसा बहाल करने के लिए “लंबा रास्ता” तय करना होगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच अविश्वास की जड़ें दशकों पुरानी हैं।
बाघेई ने कहा, “हम अमेरिका पर भरोसा नहीं करते क्योंकि हमारे पास उनके साथ पहले के अनुभव हैं जो 1953 तक जाते हैं। उस समय से लेकर अब तक दोनों देशों के बीच भरोसा समाप्त हो चुका है और यह अविश्वास गहराई तक स्थापित हो गया है।"
ईरानी प्रवक्ता के अनुसार, अमेरिका को ईरान का विश्वास हासिल करने के लिए लंबा और कठिन कूटनीतिक रास्ता अपनाना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐतिहासिक घटनाओं ने दोनों देशों के संबंधों को स्थायी रूप से प्रभावित किया है।
ईरान का अविश्वास 1953 की घटनाओं से जुड़ा है, जब पश्चिमी देशों द्वारा कथित तख्तापलट कराया गया था। इस कार्रवाई में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को सत्ता से हटाया गया था। कथित तौर पर यूके और अमेरिका ने 1953 में ईरान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग की सरकार गिरा दी थी और उन्हें पद से हटाकर कैद कर लिया गया था। उन पर तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कराने के खिलाफ पश्चिमी देश इकट्ठे हुए थे।
इसके साथ ही ईरान ने लेबनान को शांति वार्ता की अहम शर्त में शामिल करने का दावा किया है। बाघेई ने कहा कि लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता अमेरिका के साथ हुए समझौते की प्रमुख शर्तों में शामिल है। समझौते में सभी मोर्चों पर युद्ध खत्म करने और लेबनान की स्वतंत्रता व उसकी सीमाओं का सम्मान करने पर जोर दिया गया है।
इजरायल की भूमिको को लेकर भी बाघेई खास आश्वस्त नहीं दिखे। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायल ने तेहरान और वाशिंगटन के बीच युद्ध समाप्त करने की दिशा में बन रही समझ को पटरी से उतारने की कोशिश की, लेकिन ईरान और उसके सहयोगियों के प्रतिरोध ने इस प्रयास को विफल कर दिया।
साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में बाघेई ने कहा, " भविष्य की पीढ़ियां देखेंगी कि ईरान और उसके सहयोगियों ने यहूदी शासन की गतिविधियों को अपने राष्ट्रीय हितों और लेबनान के हितों की रक्षा के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।"
उन्होंने दावा किया कि इजरायल की कार्रवाई ने उल्टा प्रतिरोधी मोर्चे की एकजुटता और शक्ति को और मजबूत किया।
बाघेई ने पुष्टि की कि ईरान और अमेरिका के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) अंतिम रूप ले चुका है, जिसका उद्देश्य ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल द्वारा “थोपे गए युद्ध” को सभी मोर्चों पर समाप्त करना है। उन्होंने कहा कि पिछले 24 घंटों में महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं और यह समझौता एक बड़ी कूटनीतिक सफलता है।
ईरानी प्रवक्ता ने इस उपलब्धि का श्रेय ईरानी जनता के “ऐतिहासिक प्रतिरोध” को दिया। उन्होंने कहा कि पिछले 110 दिनों के दौरान जनता ने सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर देश का साथ दिया।
बाघेई ने ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों की भी निंदा की। उन्होंने कहा कि ईरान की शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाया गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने इस कथित अवैध कार्रवाई के खिलाफ अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई।
उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान ईरान ने अपने कई वरिष्ठ सैन्य कमांडरों और नागरिकों को खोया है, जिसे देश कभी नहीं भूलेगा।
--आईएएनएस
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