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बदलते दौर में बच्चों की जिद और सोशल मीडिया का असर, ‘रोना-धोना’ बना नया ट्रेंड

बदलते दौर में बच्चों की जिद और सोशल मीडिया का असर, ‘रोना-धोना’ बना नया ट्रेंड

बचपन की यादों में झांकें तो एक बात लगभग हर मिडिल क्लास घर में समान रूप से देखने को मिलती है—खिलौनों के लिए बच्चों की जिद और उसके बदले में माता-पिता का वही पुराना जवाब, “अभी नहीं, आगे दिलाएंगे।” कई बार यह ‘आगे’ कभी आता ही नहीं था, लेकिन बच्चे धीरे-धीरे इस सच्चाई को समझकर शांत हो जाते थे।

समय के साथ हालात बदलते गए और आज का दौर पहले से काफी अलग हो चुका है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने न सिर्फ बड़ों की जिंदगी, बल्कि बच्चों की दुनिया को भी पूरी तरह बदल दिया है। आज बच्चे सिर्फ अपनी जिद या भावनाओं को घर तक सीमित नहीं रखते, बल्कि कई बार उनका इजहार कैमरे के सामने भी होने लगा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज के डिजिटल युग में बच्चों की हरकतें और भावनाएं भी एक तरह से “कंटेंट” बनती जा रही हैं। जहां पहले रोना या जिद करना सिर्फ अपनी बात मनवाने का तरीका था, वहीं अब कई मामलों में इसे एक रणनीति या “इन्वेस्टमेंट” की तरह देखा जाने लगा है। यानी बच्चा यह समझने लगा है कि अगर वह रोएगा, तो उसे कैमरे पर रिकॉर्ड किया जाएगा और इससे उसे कुछ न कुछ फायदा मिल सकता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे कई वीडियो देखने को मिलते हैं, जहां बच्चे अपनी जिद पूरी करवाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कुछ वीडियो में बच्चे रोते हुए नजर आते हैं, तो कुछ में उनकी मासूम हरकतें लोगों का ध्यान खींचती हैं। इन वीडियो को लाखों बार देखा और शेयर किया जाता है, जिससे बच्चों को भी कहीं न कहीं यह एहसास होने लगता है कि उनकी हरकतें ध्यान आकर्षित कर सकती हैं।

बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों का इस तरह का व्यवहार उनकी सोच और परवरिश पर निर्भर करता है। यदि बच्चे को यह समझ आने लगे कि रोने या जिद करने से उसे तुरंत ध्यान या फायदा मिलता है, तो वह इस व्यवहार को बार-बार दोहरा सकता है। ऐसे में माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे बच्चों को सही और गलत का फर्क समझाएं और भावनाओं को व्यक्त करने का सही तरीका सिखाएं।

सोशल मीडिया का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। जहां एक ओर यह प्लेटफॉर्म उनकी क्रिएटिविटी को बढ़ावा देता है, वहीं दूसरी ओर यह उन्हें अनजाने में एक ऐसे ट्रेंड की ओर भी ले जा सकता है, जहां भावनाएं भी “परफॉर्मेंस” बन जाती हैं।

कुल मिलाकर, बदलते समय के साथ बच्चों का व्यवहार और उनकी सोच भी बदल रही है। “रोना-धोना” अब सिर्फ भावनाओं का इजहार नहीं, बल्कि कई बार एक रणनीति का हिस्सा बन गया है। ऐसे में माता-पिता और समाज दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों को सही दिशा में मार्गदर्शन दें, ताकि उनकी मासूमियत और सच्ची भावनाएं सुरक्षित रह सकें।

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