IIT Students Suicide: पढ़ाई के दबाव से आगे की कहानी, मेंटल हेल्थ और सिस्टम पर उठे सवाल
IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव और आत्महत्या के मामलों ने कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। निजी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में कई IIT छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं के पीछे केवल पढ़ाई का दबाव ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत परेशानियां, मानसिक स्वास्थ्य, हॉस्टल से जुड़े नियम और संस्थागत सहयोग जैसे पहलुओं पर भी चर्चा हो रही है।
IIT दिल्ली के छात्र ऋषिकेश की मौत ने उठाए सवाल
निजी मीडिया रिपोर्ट में IIT दिल्ली के छात्र ऋषिकेश कुमार के मामले का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 31 वर्षीय ऋषिकेश फिजिक्स में M.Sc. कर रहे थे। उनके परिवार के मुताबिक, पिता की मौत के बाद परिवार पर आर्थिक जिम्मेदारियां थीं और ऋषिकेश पढ़ाई पूरी कर परिवार की स्थिति सुधारना चाहते थे।
रिपोर्ट में उनके भाई अभिषेक के हवाले से दावा किया गया है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी के बाद ऋषिकेश को इलाज और काउंसलिंग की जरूरत पड़ी। परिवार का आरोप है कि संस्थान में उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। 22 अगस्त को ऋषिकेश ने हॉस्टल की छठी मंजिल से कूदकर जान दे दी।
परिवार की ओर से लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है।
IIT मद्रास के छात्र की कहानी भी सामने आई
निजी मीडिया रिपोर्ट में IIT मद्रास के पूर्व छात्र ‘प्रकाश’ का नाम बदला हुआ बताया गया है। उन्होंने अपनी निजी परेशानियों और पढ़ाई के दौरान मानसिक दबाव का अनुभव साझा किया। रिपोर्ट के मुताबिक, पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई और बाद में उन्होंने नींद की कई गोलियां खा ली थीं।
समय पर इलाज मिलने के बाद उनकी जान बच गई, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार हॉस्टल में दोबारा रहने की अनुमति से जुड़ी समस्याओं के कारण उन्होंने IIT की पढ़ाई छोड़ दी।
छात्रों के मुताबिक लगातार बनी रहती है पढ़ाई की डेडलाइन
IIT दिल्ली के एक छात्र के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि कैंपस में दबाव किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। असाइनमेंट, क्विज, लैब वर्क और अलग-अलग कोर्स की डेडलाइन लगातार चलती रहती हैं। इसके साथ ही छात्रों के बीच ग्रेड, इंटर्नशिप और प्लेसमेंट को लेकर प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बना रहता है।
ऐसे माहौल में कुछ छात्रों को अपनी परेशानियां साझा करने में झिझक महसूस होती है। रिपोर्ट में छात्रों के हवाले से मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामाजिक झिझक और काउंसलिंग सिस्टम पर भरोसे की कमी का भी जिक्र किया गया है।
काउंसलिंग सेंटर होने के बावजूद सामने आईं कमियां
IITs में छात्रों की मानसिक सेहत के लिए काउंसलिंग और वेलनेस सेंटर जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। हालांकि, निजी मीडिया रिपोर्ट में एक नेशनल टास्क फोर्स की समीक्षा का हवाला देते हुए संस्थानों की तैयारियों में कुछ कमियों का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 23 IITs की समीक्षा में केवल चार संस्थानों के पास मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए लिखित SOP मिली। इसके अलावा फैकल्टी मेंटरशिप की औपचारिक ट्रेनिंग और काउंसलर्स की ट्रेनिंग को लेकर भी सवाल सामने आए।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सिस्टम मजबूत करने की जरूरत
छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए IITs में समय-समय पर समितियां और दिशानिर्देश बनाए गए हैं। इसके बावजूद सामने आ रही घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि इन व्यवस्थाओं का वास्तविक लाभ छात्रों तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच रहा है।
ऐसे मामलों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उपलब्धता, गोपनीय काउंसलिंग, संकट की स्थिति में तत्काल सहायता, हॉस्टल नीतियों में संवेदनशीलता और शिकायतों पर जवाबदेही जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण माना जाता है। छात्रों और परिवारों की ओर से लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच और संस्थागत स्तर पर स्पष्ट प्रक्रिया भी इस तरह के मामलों में अहम हो सकती है।

