आईबीसी के 10 साल पूरे, वित्त मंत्री ने कहा- देश के फाइनेंशियल सिस्टम को मजबूत करने में मिली मदद
नई दिल्ली, 28 मई (आईएएनएस)। दिवाला एवं शोधन अक्षमता कोड (आईबीसी), 2016 को गुरुवार को 10 साल पूरे हो गए हैं। इस मौके पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि इससे देश के फाइनेंशियल सिस्टम को मजबूत करने में मदद मिली है और संकटग्रस्त कंपनियों का तेज पुनरुद्धार संभव हो पाया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर निर्मला सीतारमण ऑफिस की ओर से एक पोस्ट में कहा गया, "दिवाला एवं शोधन अक्षमता कोड (आईबीसी), 2016 ने खंडित, देनदार-नियंत्रित प्रक्रिया से एक एकीकृत, लेनदार-संचालित और समयबद्ध समाधान ढांचे की ओर निर्णायक बदलाव को संभव बनाया है।"
साथ ही कहा, "इससे इससे देश के फाइनेंशियल सिस्टम को मजबूत करने में मदद मिली है और संकटग्रस्त कंपनियों का तेज पुनरुद्धार संभव हो पाया है।"
इसके साथ ही एक पोस्टर भी शेयर किया गया, जिसमें आईबीसी के बार में विस्तृत जानकारी दी गई।
पोस्टर में बताया गया कि आईबीसी ने एक संरचनात्मक समाधान पेश किया गया है। इसके अंतर्गत कई दिवालिया कानूनों को एकल और समन्वित प्रक्रिया में एकीकृत किया है।
साथ ही कहा कि आईबीसी दिवालियापन समाधान को देनदार-नियंत्रित दृष्टिकोण से लेनदार-नेतृत्व वाले दृष्टिकोण में बदल दिया गया। वहीं, इसने समाधान प्रक्रिया में देरी और मूल्य में कमी को रोकने के लिए संरचित समयसीमाएं लागू की हैं।
इसके अतिरिक्त, आईबीसी ने वित्तीय तनाव को दूर करने और रिकवरी परिणामों में सुधार लाने के लिए एक मजबूत ढांचा भी तैयार किया है।
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के लागू होने से पहले, भारत में दिवाला समाधान कई कानूनी ढांचों के जरिये संचालित होता था। वित्तीय संकट का सामना कर रही कंपनियों से विभिन्न कानूनों के अंतर्गत निपटा जाता था, जैसे कंपनी कानून, सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज एक्ट (एसआईसीए), ऋण वसूली तंत्र तथा एसएआरएफएईएसआई सहित सुरक्षित ऋणदाता ढांचे आदि। ये प्रक्रियाएं अलग-अलग संस्थानों और मंचों के माध्यम से संचालित होती थीं, जिसके कारण कार्यवाहियां बिखरी हुई और अधिकार-क्षेत्रों में ओवरलैप की स्थिति उत्पन्न होती थी।
इसके परिणामस्वरूप, समाधान प्रक्रियाएं अकसर लंबी और अनिश्चित हो जाती थीं। मामले वर्षों तक लंबित रहते थे, जबकि संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का मूल्य लगातार घटता जाता था। देरी के कारण ऋणदाताओं की बकाया राशि वसूलने की क्षमता कमजोर पड़ती थी और व्यवहार्य व्यवसायों के पुनर्जीवन की संभावना भी कम हो जाती थी। एकीकृत और समयबद्ध तंत्र के अभाव ने समग्र ऋण अनुशासन और निवेशकों के विश्वास को भी प्रभावित किया।
इन संरचनात्मक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने व्यापक सुधार के रूप में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 को लागू किया था।
--आईएएनएस
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