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भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मिली मौत की सजा? वीडियो में जाने आजादी के बाद सिर्फ एक को दी गई फांसी

भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मिली मौत की सजा? वीडियो में जाने आजादी के बाद सिर्फ एक को दी गई फांसी

उत्तर प्रदेश के मेरठ में अक्टूबर महीने में दो अलग-अलग मामलों में महिलाओं और उनके साथियों को पति की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई। इन फैसलों के बाद एक बार फिर सवाल उठने लगा है कि भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मृत्युदंड दिया गया है और कितनी महिलाओं को वास्तव में फांसी पर लटकाया गया है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, आजादी के बाद भारत में अब तक केवल एक महिला को कानूनी तौर पर फांसी दी गई है। वहीं, अदालतों से मौत की सजा मिलने के बाद भी कई मामलों में ऊपरी अदालतों ने फैसले बदल दिए।

आजादी के बाद सिर्फ एक महिला को हुई फांसी

नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, रतन बाई जैन आजादी के बाद भारत में फांसी पर चढ़ाई जाने वाली एकमात्र महिला थीं। उन्हें तीन बच्चियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। इसके बाद 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में उन्हें फांसी दी गई थी।रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद से अब तक किसी दूसरी महिला को भारत में फांसी नहीं दी गई है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि महिलाओं को अदालतों से मृत्युदंड नहीं मिला। कई मामलों में निचली अदालतों ने महिलाओं को मौत की सजा सुनाई, लेकिन बाद में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में उन फैसलों को बदल दिया गया।

निचली अदालत की सजा अंतिम नहीं होती

भारत में किसी व्यक्ति को निचली अदालत से मौत की सजा मिलने का मतलब यह नहीं है कि उसे तुरंत फांसी दे दी जाएगी। मृत्युदंड के मामलों में कानूनी प्रक्रिया के तहत ऊपरी अदालतों की समीक्षा जरूरी होती है।भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 407 के तहत सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को पुष्टि के लिए हाईकोर्ट के सामने भेजना आवश्यक है। हाईकोर्ट की मंजूरी के बिना इस सजा को लागू नहीं किया जा सकता।इसके बाद भी दोषी के पास कानूनी विकल्प मौजूद रहते हैं। वह सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है। अपील खारिज होने की स्थिति में समीक्षा याचिका और निर्धारित परिस्थितियों में क्यूरेटिव याचिका भी दाखिल की जा सकती है। इसके अलावा दोषी राष्ट्रपति या संबंधित राज्य के राज्यपाल के समक्ष दया याचिका भी प्रस्तुत कर सकता है।

2016 से 2025 के बीच कितनी सजाएं बरकरार रहीं?

नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई मौत की सजाओं में से कई फैसले ऊपरी अदालतों में बदल दिए गए। इस अवधि में हाईकोर्ट ने मृत्युदंड के केवल 9.77 प्रतिशत मामलों में सजा बरकरार रखी।यह आंकड़ा बताता है कि मृत्युदंड के मामलों में निचली अदालत का फैसला अंतिम नहीं होता। ऊपरी अदालतें मामले के तथ्यों, सबूतों, अपराध की परिस्थितियों और कानूनी पहलुओं की समीक्षा करती हैं। इसके आधार पर सजा को बरकरार रखा जा सकता है, बदला जा सकता है या आरोपी को राहत दी जा सकती है।

मेरठ के मामलों के बाद फिर चर्चा

मेरठ में महिलाओं को पति की हत्या के मामलों में मौत की सजा सुनाए जाने के बाद मृत्युदंड को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, निचली अदालत से मौत की सजा मिलने और वास्तव में फांसी दिए जाने के बीच लंबी कानूनी प्रक्रिया होती है।इसलिए किसी महिला या पुरुष को मृत्युदंड सुनाए जाने की खबर का मतलब यह नहीं है कि उसे फांसी देना तय हो गया है। अंतिम स्थिति अपील, ऊपरी अदालतों के फैसलों और दया याचिका जैसी कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है। भारत में मृत्युदंड के मामलों में यही प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि अंतिम निर्णय से पहले मामले की कई स्तरों पर समीक्षा हो।

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