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ट्रंप प्रशासन की चेतावनी, अमेरिका में चुनावी डेटा पर साइबर हमले का खतरा

ट्रंप प्रशासन की चेतावनी, अमेरिका में चुनावी डेटा पर साइबर हमले का खतरा
ट्रंप प्रशासन की चेतावनी, अमेरिका में चुनावी डेटा पर साइबर हमले का खतरा

वाशिंगटन, 17 जुलाई (आईएएनएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल ही में सार्वजनिक किए गए गोपनीय खुफिया और साइबर सुरक्षा आकलनों में चेतावनी दी कि देश के मतदाता पंजीकरण डेटाबेस अब भी विदेशी साइबर हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। अगर यह डेटा चोरी होता है तो उसका दुरुपयोग कई वर्षों तक किया जा सकता है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी सुरक्षा पर दिए गए संबोधन के बाद जारी इन दस्तावेजों में कहा गया कि मतदाता पंजीकरण डेटाबेस विदेशी खुफिया एजेंसियों और साइबर हमलावरों के लिए सबसे आकर्षक लक्ष्यों में से एक हैं। इनका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालना और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर करना हो सकता है।

व्हाइट हाउस द्वारा जारी अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में अमेरिका के सभी 50 राज्यों के मतदाता पंजीकरण सिस्टम को हैक करने की कोशिश की गई। इनमें से कम से कम 20 राज्यों में साइबर हमलावरों को सेंध लगाए।

रिपोर्ट में कहा गया, "राज्य स्तर के मतदाता पंजीकरण डेटाबेस विदेशी विरोधी देशों के लिए बेहद आकर्षक लक्ष्य हैं।" इसमें यह भी चेतावनी दी गई है कि मतदाताओं की संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी लीक होने का खतरा सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव लंबे समय तक रह सकते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, चोरी किए गए मतदाता डेटा का इस्तेमाल डाक मतपत्र के लिए फर्जी आवेदन करने, मतदाता पंजीकरण रिकॉर्ड में बदलाव करने, मतदान केंद्र बदलने या मतदाता का नाम सूची से हटाने जैसे कामों में किया जा सकता है।

इस आकलन रिपोर्ट में वर्ष 2016 के बाद से चुनावी ढांचे पर हुए कई साइबर हमलों का भी जिक्र किया गया। इनमें वोटर रजिस्ट्रेशन डेटाबेस की जांच करने की रूस की कोशिशें, वोटर रजिस्ट्रेशन की जानकारी हासिल करने का ईरान का प्रयास और चुनाव से जुड़े नेटवर्क एवं आम लोगों के लिए उपलब्ध वोटर डेटा को निशाना बनाने वाली चीन की संदिग्ध साइबर गतिविधियां शामिल हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि हाल ही में सार्वजनिक किए गए खुफिया दस्तावेज यह साबित करते हैं कि अमेरिका लंबे समय से जानता था कि उसकी चुनावी व्यवस्था विदेशी साइबर खतरों के संपर्क में है।

उन्होंने बताया कि खुफिया एजेंसियों ने मतदाता पंजीकरण डेटाबेस, इलेक्ट्रॉनिक पोल बुक और आधिकारिक चुनावी वेबसाइटों को सबसे अधिक जोखिम वाले सिस्टम के रूप में चिह्नित किया है।

डीएचएस की रिपोर्ट में राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों को साइबर सुरक्षा मजबूत करने के लिए कई सुझाव भी दिए गए हैं। इनमें मतदाता डेटाबेस का नियमित ऑफलाइन बैकअप, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन का व्यापक उपयोग, नेटवर्क को अलग-अलग हिस्सों में बांटना, इंटरनेट से जुड़े सिस्टम की लगातार निगरानी और किसी भी साइबर हमले से निपटने के लिए व्यापक योजना तैयार करना शामिल है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बैंकों, स्वास्थ्य सेवाओं और क्रेडिट रिपोर्टिंग एजेंसियों जैसी निजी कंपनियों के पास मौजूद व्यक्तिगत डेटा में बड़ी सेंध भी चुनावी सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि इसी तरह की व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग मतदाताओं की पहचान सत्यापित करने और डाक मतपत्र जारी करने में किया जाता है।

ट्रंप ने बताया कि उनका प्रशासन संभावित साइबर कमजोरियों से प्रभावित राज्यों के राज्यपालों, सांसदों और चुनाव अधिकारियों को सूचना देना शुरू कर चुका है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग अगले वर्ष होने वाले मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों से पहले राज्यों के साथ मिलकर इन तकनीकी कमजोरियों को दूर करेगा।

हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि अब तक ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं निकला है कि इन साइबर हमलों ने किसी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम को बदला हो। फिर भी रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी देशों की बढ़ती साइबर क्षमताओं को देखते हुए मतदाता पंजीकरण डेटाबेस की सुरक्षा अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो गई है।

--आईएएनएस

वीकेयू/पीएम

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