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अमेरिका ने सहयोगी देशों से ‘क्रिटिकल मिनरल्स ब्लॉक’ बनाने का आह्वान किया

वॉशिंगटन, 4 फरवरी (आईएएनएस)। अमेरिका ने मंगलवार को अपने सहयोगी और साझेदार देशों से प्रस्तावित ‘क्रिटिकल मिनरल्स ट्रेडिंग ब्लॉक’ में शामिल होने का आग्रह किया। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि बाजारों को स्थिर करने और आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए समन्वित वैश्विक कार्रवाई की जरूरत है।
अमेरिका ने सहयोगी देशों से ‘क्रिटिकल मिनरल्स ब्लॉक’ बनाने का आह्वान किया

वॉशिंगटन, 4 फरवरी (आईएएनएस)। अमेरिका ने मंगलवार को अपने सहयोगी और साझेदार देशों से प्रस्तावित ‘क्रिटिकल मिनरल्स ट्रेडिंग ब्लॉक’ में शामिल होने का आग्रह किया। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि बाजारों को स्थिर करने और आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने के लिए समन्वित वैश्विक कार्रवाई की जरूरत है।

वाशिंगटन में आयोजित ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ बैठक का उद्घाटन करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने इस पहल की रूपरेखा रखी। उन्होंने कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स का वैश्विक बाजार सही तरीके से काम नहीं कर रहा है, जिससे अर्थव्यवस्थाएं जोखिम में पड़ रही हैं।

वेंस ने कहा, “क्रिटिकल मिनरल्स से ज्यादा वास्तविक कुछ नहीं है।” उन्होंने इन्हें आधुनिक अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय रक्षा और उन्नत तकनीक के लिए अनिवार्य बताया।

उन्होंने कहा कि मौजूदा आपूर्ति श्रृंखलाएं बेहद कमजोर और सीमित देशों तक केंद्रित हैं। कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव है, निवेश अस्थिर है और कई परियोजनाएं तब ढह जाती हैं, जब अचानक बाजार में आपूर्ति बढ़ने से कीमतें गिर जाती हैं।

उपराष्ट्रपति ने बताया कि बैठक में शामिल देश वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब दो-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं और मिलकर वे इस बाजार की दिशा बदलने की ताकत रखते हैं। उन्होंने कहा, “हम सब एक ही टीम में हैं।”

वेंस ने क्रिटिकल मिनरल्स के लिए एक प्राथमिक व्यापार क्षेत्र (प्रेफरेंशियल ट्रेड जोन) बनाने का प्रस्ताव रखा। यह जोन बाहरी व्यवधानों से सुरक्षित रहेगा और उत्पादन के हर चरण पर तय की गई संदर्भ कीमतों पर आधारित होगा।

उन्होंने कहा कि ये कीमतें न्यूनतम स्तर (प्राइस फ्लोर) के रूप में काम करेंगी, जिन्हें समायोज्य शुल्क (टैरिफ) के जरिए लागू किया जाएगा। इसका उद्देश्य बाजार में सस्ती डंपिंग को रोकना है, जिससे घरेलू उत्पादकों को नुकसान होता है और दीर्घकालिक निवेशक पीछे हट जाते हैं।

वेंस ने कहा, “हम चाहते हैं कि सहयोगी और साझेदार देश मिलकर एक ट्रेडिंग ब्लॉक बनाएं।” उनके अनुसार, स्थिर कीमतें निजी निवेश और लंबी अवधि की योजना बनाने में मदद करेंगी और आपात स्थिति में खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगी।

उन्होंने कहा कि इस पहल का मकसद उत्पादन के विविध केंद्र विकसित करना है, ताकि आपूर्ति श्रृंखलाएं मजबूत हों और बाजार अधिक अनुमानित बन सके।

इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी उद्घाटन भाषण दिया। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। रुबियो ने कहा, “क्रिटिकल मिनरल्स उन उपकरणों के लिए बेहद जरूरी हैं, जिनका हम रोजाना इस्तेमाल करते हैं।” उन्होंने बताया कि ये खनिज बुनियादी ढांचे, उद्योग और राष्ट्रीय रक्षा को ऊर्जा प्रदान करते हैं।

रुबियो ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही इस मुद्दे को प्राथमिकता दी। उन्होंने मार्च में जारी एक कार्यकारी आदेश का जिक्र किया, जिसका उद्देश्य खनन परियोजनाओं की मंजूरी में तेजी लाना, घरेलू खनन को बढ़ावा देना और देश व विदेश में आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करना है।

उन्होंने बताया कि अक्टूबर में अमेरिका ने पांच देशों के साथ 10 अरब डॉलर से अधिक के क्रिटिकल मिनरल समझौते किए थे। इसके अलावा, उन्होंने दिसंबर में आयोजित ‘पैक्स सिलिका समिट’ का भी हवाला दिया, जिसमें मजबूत सिलिकॉन आपूर्ति श्रृंखला के लिए साझेदारी शुरू की गई।

रुबियो ने चेतावनी दी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का विकास खदानें दोबारा खोलने और फैक्ट्रियों के पुनर्निर्माण के बिना संभव नहीं होगा।

उन्होंने अमेरिकी इतिहास का जिक्र करते हुए बताया कि 1949 में कैलिफोर्निया के माउंटेन पास में दुर्लभ खनिजों की खोज ने जेट युग, अंतरिक्ष युग और कंप्यूटर युग को गति दी थी। बाद के वर्षों में खनन की अनदेखी हुई, विनिर्माण विदेशों में चला गया और आपूर्ति श्रृंखलाएं कमजोर पड़ गईं।

रुबियो ने कहा, “एक दिन हमें एहसास हुआ कि हमने अपनी आर्थिक सुरक्षा और भविष्य को आउटसोर्स कर दिया है।”

उन्होंने मौजूदा हालात की तुलना करीब 50 साल पहले हुई वाशिंगटन एनर्जी कॉन्फ्रेंस से की, जिसके बाद इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का गठन हुआ था, जब तेल को राजनीतिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा था।

रुबियो ने जोर देकर कहा, “यह सिर्फ अमेरिका की पहल नहीं है। यह समान सोच वाले देशों के साथ एक अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक पहल होनी चाहिए।”

--आईएएनएस

डीएससी

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