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अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका ‘फैसिलिटेटर’ तक सीमित: रिपोर्ट

इस्लामाबाद, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। हाल ही में इस्लामाबाद में हुई अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता से अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सके, लेकिन फारस की खाड़ी में स्थायी और न्यायपूर्ण शांति के लिए शांति प्रक्रिया को अन्य माध्यमों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह बात एक रिपोर्ट में कही गई है।
अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका ‘फैसिलिटेटर’ तक सीमित: रिपोर्ट

इस्लामाबाद, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। हाल ही में इस्लामाबाद में हुई अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता से अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सके, लेकिन फारस की खाड़ी में स्थायी और न्यायपूर्ण शांति के लिए शांति प्रक्रिया को अन्य माध्यमों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह बात एक रिपोर्ट में कही गई है।

रिपोर्ट में पर्यवेक्षकों के हवाले से कहा गया है कि शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका ‘मध्यस्थ’ (मेडिएटर) की बजाय ‘फैसिलिटेटर’ (सुविधा प्रदान करने वाले) की रही। इसमें बताया गया कि जहां मध्यस्थ दोनों पक्षों को साझा समाधान की ओर ले जाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाता है, वहीं फैसिलिटेटर केवल दोनों पक्षों के बीच संदेश और जानकारी के आदान-प्रदान का काम करता है।

‘पोलिटिया रिसर्च फाउंडेशन’ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट में तेल और वस्तुओं की आपूर्ति बाधित किए जाने से कई देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा। इस दौरान ईरान में भारी जान-माल का नुकसान हुआ, जबकि खाड़ी के कई देशों में भी नागरिक ठिकानों और ऊर्जा ढांचे पर हमले हुए।

रिपोर्ट के अनुसार, 7 अप्रैल 2026 को हुए युद्धविराम और उसके बाद शुरू हुई शांति वार्ता से क्षेत्र में स्थायी शांति की उम्मीद जगी। वैश्विक मीडिया और भारत में भी पाकिस्तान को वार्ता के मंच के रूप में उभरने पर चर्चा हुई। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका और ईरान ने विशेष भू-राजनीतिक परिस्थितियों के चलते पाकिस्तान को एक फैसिलिटेटर के रूप में चुना।

रिपोर्ट के लेखक और पोलिटिया रिसर्च फाउंडेशन के चेयरपर्सन संजय पुलिपाका ने लिखा कि होर्मुज जलडमरूमध्य का भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यधिक महत्व है। ऐसे में भारत यदि किसी मध्यस्थ की भूमिका में आता, तो वह सक्रिय हस्तक्षेप करता, जो सभी विकासशील देशों के हित में समुद्री मार्ग खुले रखने पर जोर देता। इसी कारण मौजूदा हालात में नई दिल्ली को प्राथमिक मध्यस्थ के रूप में नहीं चुना गया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, जो ईरान के साथ संभावित संघर्ष की स्थिति में उसकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

इसके अलावा, ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव, खाड़ी देशों की भागीदारी और क्षेत्र में अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाने के पाकिस्तान के लंबे अनुभव को देखते हुए इस्लामाबाद को वार्ता के लिए उपयुक्त मंच माना गया।

रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि ईरान युद्ध के चलते अफगानिस्तान में पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाइयों, जिनमें सैकड़ों नागरिकों की मौत हुई, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त ध्यान नहीं गया। साथ ही आशंका जताई गई कि इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता की चर्चा के बीच पड़ोसी क्षेत्रों में पाकिस्तान की हिंसक गतिविधियां दब सकती हैं।

--आईएएनएस

डीएससी

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