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यूपी में सरकारी नौकरियों के लिए चरित्र सत्यापन के नियम सख्त, हिंसक गतिविधियों से जुड़े लोग होंगे अयोग्य

यूपी में सरकारी नौकरियों के लिए चरित्र सत्यापन के नियम सख्त, हिंसक गतिविधियों से जुड़े लोग होंगे अयोग्य
यूपी में सरकारी नौकरियों के लिए चरित्र सत्यापन के नियम सख्त, हिंसक गतिविधियों से जुड़े लोग होंगे अयोग्य

लखनऊ, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों में सीधी भर्ती के लिए चुने गए उम्मीदवारों के चरित्र सत्यापन के नियमों को सख्त कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जो लोग ऐसे संगठनों से जुड़े हैं, जो मौजूदा सामाजिक व्यवस्था में हिंसक बदलाव की वकालत करते हैं, उन्हें नियुक्ति के लिए अयोग्य माना जाएगा।

यह कदम हाल ही में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 'सत्ता परिवर्तन' की मांग को लेकर हुए विवाद के बीच उठाया गया है, जिसकी विपक्षी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने आलोचना की है।

संशोधित दिशानिर्देशों के तहत हिंसा के माध्यम से मौजूदा व्यवस्था को बदलने के उद्देश्य से किए गए विरोध प्रदर्शनों या गतिविधियों में शामिल होने पर उम्मीदवार सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य हो सकते हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी उम्मीदवार को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।

यह निर्देश नियुक्ति विभाग के प्रधान सचिव एम. देवराज द्वारा जारी किया गया है और यह सरकारी विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती पर लागू होता है।

आदेश के अनुसार, जो व्यक्ति ऐसे संगठनों के सदस्य हैं, जिनका घोषित उद्देश्य हिंसा के माध्यम से मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को बदलना है, उन्हें सरकारी नियुक्तियों के लिए अनुपयुक्त माना जाएगा।

आदेश में कहा गया है, "किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के कारण नियुक्ति के लिए अनुपयुक्त नहीं माना जाएगा। हालांकि जो व्यक्ति ऐसे संगठन के सदस्य हैं जिनका घोषित उद्देश्य हिंसा के माध्यम से मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को बदलना है, उन्हें सरकारी नियुक्ति के लिए अयोग्य माना जाएगा।"

आदेश में यह भी बताया गया है कि 21 साल की उम्र के बाद और सत्यापन (वेरिफिकेशन) से ठीक पहले के तीन वर्षों के दौरान ऐसी गतिविधियों में शामिल होने को इस बात का सबूत माना जाएगा कि संबंधित व्यक्ति अभी इनमें सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है, जब तक कि कोई ठोस सबूत यह न दिखा दे कि उस दौरान उसकी प्रवृत्तियों में कोई बदलाव आया है।

संशोधित नीति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एफआईआर दर्ज होने या किसी मामले की जांच लंबित होने मात्र से कोई उम्मीदवार सरकारी नौकरी के लिए अपने आप अयोग्य नहीं हो जाएगा।

जिन उम्मीदवारों को बरी कर दिया गया है, जिनके मामले आपसी समझौते से सुलझा लिए गए हैं या जो किशोर न्याय कानूनों के दायरे में आते हैं, उन्हें भी इन दिशानिर्देशों के तहत स्वतः अयोग्य नहीं माना जाएगा।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि चरित्र सत्यापन रिपोर्ट मिलने में देरी होने के कारण नियुक्ति पत्र जारी करने में देरी करना जरूरी नहीं है। संबंधित अधिकारी उम्मीदवारों से जरूरी दस्तावेज और स्व-घोषणा पत्र प्राप्त करने के बाद उन्हें अनंतिम नियुक्ति पत्र जारी कर सकते हैं।

हालांकि यदि सत्यापन के दौरान कोई उम्मीदवार अयोग्य पाया जाता है या यह पता चलता है कि उसने गलत जानकारी दी है, तो उसकी नियुक्ति तुरंत रद्द कर दी जाएगी और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

इस आदेश में उन कर्मचारियों को भी छूट दी गई है जो पहले से ही सरकारी विभागों में कार्यरत हैं, उन्हें फिर से चरित्र सत्यापन कराने की आवश्यकता नहीं होगी। हालांकि, नियुक्ति प्राधिकारी जरूरत पड़ने पर उनके पिछले विभागों से संबंधित जानकारी मांग सकते हैं।

पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे 30 दिनों के भीतर चरित्र सत्यापन रिपोर्ट सौंप दें, ताकि भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो। सरकार ने कहा कि इन संशोधित दिशानिर्देशों का उद्देश्य चरित्र सत्यापन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना है कि लंबित जांच या प्रक्रियात्मक देरी के कारण योग्य उम्मीदवार सरकारी नौकरी पाने के अवसर से वंचित न रह जाए।

--आईएएनएस

ओपी/वीसी

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