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संगठनात्मक चुनावों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को लेकर ममता बनर्जी खेमे की तैयारी, दो तर्कों पर भरोसा

संगठनात्मक चुनावों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को लेकर ममता बनर्जी खेमे की तैयारी, दो तर्कों पर भरोसा
संगठनात्मक चुनावों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को लेकर ममता बनर्जी खेमे की तैयारी, दो तर्कों पर भरोसा

कोलकाता, 4 जुलाई (आईएएनएस)। चुनाव आयोग की ओर से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के दोनों गुटों से संगठनात्मक चुनावों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को लेकर चल रहे विवाद पर 6 जुलाई तक अपना जवाब देने के लिए कहा गया है। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से ऋतब्रत बनर्जी गुट के दावों का तर्कों से मुकाबला करने की तैयारी की जा रही है।

ममता बनर्जी खेमे के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पहला तर्क उन बागी विधायकों की स्थिति से जुड़ा है, जिन्हें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर ममता बनर्जी की मंजूरी और हस्ताक्षर से तृणमूल कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया गया था।

ममता खेमे से जुड़े एक विधायक ने कहा, "हमारा कहना है कि इन विधायकों ने (जिनमें ऋतुब्रता बनर्जी भी शामिल हैं) ममता बनर्जी की ओर से नामित किए जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस के टिकट और चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा और जीता, इसलिए वह बाद में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा नहीं कर सकते।"

ममता बनर्जी खेमा चुनाव आयोग को सौंपी जाने वाली अपनी दलील में अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (ऑथराइज्ड सिग्नेटरी) के मुद्दे को प्रमुखता से उठा सकता है।

ममता बनर्जी गुट का दूसरा तर्क बागी गुट की ओर से पिछले महीने घोषित नई राष्ट्रीय कार्यसमिति की वैधता से जुड़ा है, जिसमें ममता बनर्जी की जगह विधायक अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था। ममता खेमे का तर्क है कि यह कदम पूरी तरह से पश्चिम बंगाल विधानसभा में बागियों की संख्या बल पर आधारित था।

ममता बनर्जी गुट के एक विधायक ने कहा, "फरवरी 2022 के अधिवेशन में ममता बनर्जी को आजीवन पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष फिर से चुना गया था, जिसमें न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि भारत के अन्य राज्यों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। इसलिए, राज्य विधानसभा में संख्या बल के आधार पर घोषित नई राष्ट्रीय कार्यसमिति वैध नहीं हो सकती, इसलिए पार्टी के नाम और चिह्न पर दावा नहीं कर सकती।"

ममता खेमे की ओर से इस बात पर भी जोर देने की प्लानिंग की जा रही है कि मौजूदा चुनौती शुरू करने से पहले ही ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया गया था। ममता खेमे के विधायक ने तर्क दिया, “हमारा सवाल यह है कि एक निष्कासित विधायक और उनके समर्थकों की टीम पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा कैसे कर सकती है।”

चुनाव आयोग की ओर से संगठनात्मक चुनावों और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के बारे में स्पष्टीकरण मांगने के लिए दोनों गुटों को 2 जुलाई को पत्र जारी किए थे। उसी दिन ऋतब्रत के नेतृत्व वाला गुट चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के सामने पेश हुआ और तर्क दिया कि संख्या-बल में बहुमत होने के कारण पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर नियंत्रण का अधिकार उनका है।

पत्रकारों से बात करते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने कहा था कि पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर अलग से कोई मांग करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि गुट के पास संख्या बल का बहुमत है, जिससे उसका दावा पहले ही साबित हो जाता है।

--आईएएनएस

एसडी/डीकेपी

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