कट्टरपंथ फैलाने के लिए आतंकी संगठनों ने सोशल मीडिया को बनाया अपना हथियार, ये रिपोर्ट चौंका देगी
नई दिल्ली, 8 मार्च (आईएएनएस)। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया के जरिए जानकारी और खबरें बहुत तेजी से लोगों तक पहुंचती हैं। लोग तुरंत घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन यूरेशिया रिव्यू की एक चौकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। इसके मुताबिक आतंकी संगठन तेजी से कट्टरपंथ फैलाने और हमलों की साजिश रचने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं।
आधुनिक आतंकी संगठन अब केवल वैचारिक मतभेदों या लॉजिस्टिक नेटवर्क का ही नहीं, बल्कि उन्नत डिजिटल तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें हथियार की तरह प्रयोग कर रहे हैं।
‘कट्टरपंथ फैलाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का हथियारीकरण: भारतीय उपमहाद्वीप पर मंडराता बड़ा खतरा’ शीर्षक वाली रिपोर्ट के मुताबिक 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी हमले और 14 दिसंबर 2025 को ऑस्ट्रेलिया के बोंडी बीच पर हालिया हमले यह दिखाते हैं कि चरमपंथी नेटवर्क किस तरह सोशल मीडिया का सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल कर हिंसा भड़काने का काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि डिजिटल प्रोपेगेंडा, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन मनोवैज्ञानिक हेरफेर के जरिए कमजोर और संवेदनशील लोगों को आतंकी गतिविधियों के लिए सक्रिय किया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं को अक्सर ‘लोन वुल्फ’ हमले के रूप में दिखने की कोशिश रहती है, लेकिन हकीकत में ऐसे हमले व्यक्तिगत नहीं बल्कि संगठित और योजनाबद्ध होते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकी संगठन लोगों को प्रभावित करने के लिए फेक न्यूज, प्रोपेगेंडा और नैरेटिव वॉरफेयर का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन तरीकों से कमजोर, अस्थिर या समाज से कटे हुए लोगों को धर्म, राज्य या किसी काल्पनिक एजेंडे के नाम पर उकसाया जाता है।
सोशल मीडिया की कम लागत, विकेंद्रीकृत ढांचा, तेज गति और वैश्विक पहुंच जैसी विशेषताएं इसे चरमपंथी संगठनों के लिए प्रचार अभियान चलाने, समर्थकों की भर्ती करने और हमलों के लिए लोगों को संगठित करने का प्रभावी माध्यम बना देती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि भले ही सोशल मीडिया आतंकवाद का मुख्य कारण न हो, लेकिन आधुनिक आतंकवाद के चक्र में इसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट में इस्लामिक स्टेट और उसके सहयोगी संगठनों की भूमिका का भी जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि इराक और सीरिया में क्षेत्रीय नुकसान के बावजूद आईएस ने अपने डिजिटल ऑपरेशन मजबूत किए हैं और ऑनलाइन प्रोपेगेंडा नेटवर्क के जरिए वैचारिक प्रभाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई है।
रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में भी चरमपंथी नेटवर्क तेजी से सक्रिय हो रहे हैं। 2024 तक आईएस के ऑनलाइन नेटवर्क भारत और बांग्लादेश जैसे देशों तक फैल गए, जहां सुरक्षित संचार माध्यमों के जरिए संवेदनशील आबादी को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
रिपोर्ट में पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों 'द रजिस्टेंस फ्रंट' और 'पीपुल्स एंटी फासटिस्ट फ्रंट' का भी उल्लेख किया गया है, जिन पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए प्रोपेगेंडा फैलाने का आरोप लगाया गया है। इसके अलावा जमात ए इस्लामी के बांग्लादेश में गहरे प्रभाव और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े कथित समर्थन नेटवर्क का भी जिक्र किया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि रेड फोर्ट हमले से जुड़े हमलावर ऑनलाइन कट्टरपंथ का शिकार हुए थे। जांचकर्ताओं ने इसे “व्हाइट कॉलर टेररिज्म” बताया, क्योंकि इसमें शामिल कई लोग शिक्षित पृष्ठभूमि से थे।
आतंकियों द्वारा एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म थ्रीमा का इस्तेमाल भी किया गया, जिसमें एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, मेटाडेटा स्टोरेज न होना और मैसेज डिलीट करने जैसी सुविधाएं होती हैं, जिससे फोरेंसिक जांच मुश्किल हो जाती है।
रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में साइबर आधारित आतंकवाद के बढ़ते खतरे का भी जिक्र किया गया है, जहां ऑनलाइन भर्ती अभियान और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं को चरमपंथी नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक कई देशों ने ऑनलाइन चरमपंथ से निपटने के लिए कड़े कानून और नियम लागू करना शुरू कर दिया है। ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया जैसे देशों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं, जबकि भारत ने 2025 में ही कट्टरपंथ और आतंकी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले 9,845 यूआरएल ब्लॉक किए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर सहयोग जरूरी होगा। इसके लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई गई है।
--आईएएनएस
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