मौजूदा भू-आर्थिक अनिश्चितता के बीच साझा विकास के लिए समुद्र और समुद्री हाईवे को सुरक्षित करें: विशेषज्ञ
नई दिल्ली, 30 सितंबर (आईएएनएस)। भले ही भू-राजनीतिक संकटों ने समुद्री हाईवे को बुरी तरह प्रभावित किया हो, लेकिन इसने दिखा दिया है कि वैकल्पिक मार्ग बनाना अब भारत के लिए कोई विकल्प नहीं, बल्कि प्राथमिकता है। नई दिल्ली में बुधवार को 'इंडो-पैसिफिक में भारत-आसियान समुद्री सहयोग को मजबूत करना' विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में कई विशेषज्ञों ने यह बात कही।
चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) द्वारा आयोजित इस बैठक में शीर्ष विश्लेषकों ने इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा के लिए वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग विकसित करने, समुद्री कनेक्टिविटी को मजबूत करने और क्षेत्रीय सहयोग को गहरा करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि महासागरों की सुरक्षा में भारत और आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन) को बड़ी भूमिका निभानी होगी।
भारत और आसियान के पास पहले से ही कई मंचों और तंत्रों में एक मजबूत संस्थागत आधार है, लेकिन कार्यान्वयन में अभिसरण (तालमेल) बेहद जरूरी है। जहां समुद्र स्वाभाविक रूप से देशों को जोड़ते हैं, वहीं उनके बीच की कनेक्टिविटी ही भूगोल को अवसर में बदलती है।
पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव आर. लक्ष्मणन ने कहा, "एक वेरी लार्ज क्रूड कैरियर (वीएलसीसी) को किराए पर लेने की लागत संकट-पूर्व युग की तुलना में लगभग 10 गुना बढ़ गई है, और एक कंटेनर जहाज को किराए पर लेने की लागत पांच गुना बढ़ गई है, जो विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स लागत और समग्र आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन को प्रभावित करता है।"
उन्होंने कहा कि बेहतर सूचना-साझाकरण और सूचना संलयन केंद्र-हिंद महासागर क्षेत्र (आईएफसी-आईओआर), जो भारतीय नौसेना द्वारा संचालित केंद्र है और क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखता है, द्वारा निभाई जा रही भूमिका-ऐसे झटकों को कम करने का एक तरीका है।
लक्ष्मणन ने कहा, "आईएफसी-आईओआर मुख्य रूप से एक सुरक्षा, नौसेना और तटरक्षक से संबंधित तंत्र है, लेकिन हम बंदरगाह अधिकारियों और सीमा शुल्क एजेंसियों को शामिल करके इसके दायरे को वाणिज्यिक पक्ष तक बढ़ा सकते हैं, जिससे हम व्यापार और वाणिज्यिक शिपिंग में व्यवधानों को ट्रैक कर सकेंगे और सूचना के आदान-प्रदान को सुगम बना सकेंगे।"
अन्य विशेषज्ञों का मानना था कि भारत-आसियान समुद्री सहयोग साझा भूगोल, आर्थिक परस्पर निर्भरता और एक सुरक्षित और लचीले इंडो-पैसिफिक में साझा हित पर आधारित है। राजदूत जयदीप मजूमदार ने इस अभिसरण को रेखांकित करते हुए कहा, "भारत-आसियान समुद्री सहयोग घोषणात्मक संरेखण से विकसित होकर एक संरचित, बहुआयामी साझेदारी बन गया है। अब चुनौती इस अभिसरण को ठोस परिणामों में बदलने की है, ताकि समुद्री आकस्मिकताओं-चाहे वे अपेक्षित हों या अप्रत्याशित-के लिए साझा समझ और संयुक्त प्रतिक्रियाएं बनाई जा सकें।"
कनेक्टिविटी क्यों मायने रखती है, इस बात को दोहराते हुए वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा (सेवानिवृत्त) ने कहा कि साझा विकास के लिए महासागरों को खुला रहना चाहिए और सुरक्षित समुद्रों, सुरक्षित शिपिंग लेन के साथ ही परस्पर निर्भर दुनिया में साझा समृद्धि आती है।
सम्मेलन में इस बात पर विचार किया गया कि बढ़ती भू-आर्थिक अनिश्चितता, समुद्री व्यवधानों और क्षेत्रीय हेजिंग के बीच भारत-आसियान सहयोग को कैसे व्यापक और अधिक लचीला बनाया जा सकता है। इंडो-पैसिफिक पर आसियान आउटलुक (एओआईपी), भारत की इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (आईपीओआई), एक्ट ईस्ट नीति और महासागर जैसे ढांचों के बीच व्यावहारिक अभिसरण को मजबूत करने के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति-श्रृंखला लचीलापन और ऊर्जा सहयोग में सुधार पर जोर दिया गया।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि होर्मुज स्ट्रेट संकट दूरस्थ ऊर्जा मार्गों और क्षेत्रीय चोकपॉइंट्स की परस्पर जुड़ी कमजोरियों को उजागर करता है, जो विविध ऊर्जा और व्यापार मार्गों, पूर्वी तट पर बंदरगाह क्षमता को मजबूत करने, वैकल्पिक कनेक्टिविटी कॉरिडोर, समुद्री डोमेन जागरूकता और सूचना-साझाकरण की आवश्यकता को और मजबूत करता है। उन्होंने नौसेना और तटरक्षक सहयोग, समन्वित गश्त और अभ्यास, एचएडीआर और खोज एवं बचाव, महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा और एआरएफ और एडीएमएम-प्लस जैसे आसियान-नेतृत्व वाले मंचों के अधिक उपयोग का भी आह्वान किया।
उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सहित क्षमता-निर्माण, रक्षा सहयोग और कनेक्टिविटी के जरिए आसियान के साथ भारत की भागीदारी को गहरा करने की जरूरत पर भी प्रकाश डाला।
वक्ताओं ने जोर दिया कि प्राथमिकता मौजूदा ढांचों और पहलों को मजबूत संस्थागत समन्वय, संकट तैयारी और सूचना-साझाकरण के माध्यम से निरंतर परिचालन परिणामों में बदलना होना चाहिए। ऊर्जा विविधीकरण, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और समुद्री डोमेन जागरूकता लचीलापन बनाने के प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभरे, जबकि गश्त, अभ्यास, एचएडीआर, खोज एवं बचाव और आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा में व्यावहारिक सहयोग साझेदारी को मजबूत कर सकता है।
2027 में भारत-आसियान संवाद साझेदारी के 35 साल पूरे होने के साथ, पहचानी गई मुख्य चुनौती स्थापित सहयोग एजेंडे को ठोस और निरंतर परिणामों में बदलना थी।
--आईएएनएस
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