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रोहित रॉय का कूड़ेदान वाला बयान गलत लेकिन टीवी इंडस्ट्री को आत्ममंथन की जरूरत: संदीप सिकंद

रोहित रॉय का कूड़ेदान वाला बयान गलत लेकिन टीवी इंडस्ट्री को आत्ममंथन की जरूरत: संदीप सिकंद
रोहित रॉय का कूड़ेदान वाला बयान गलत लेकिन टीवी इंडस्ट्री को आत्ममंथन की जरूरत: संदीप सिकंद

मुंबई, 18 सितंबर (आईएएनएस)। निर्माता और टेलीविजन से जुड़े संदीप सिकंद ने अभिनेता रोहित रॉय के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने टेलीविजन को 'कूड़ेदान' जैसा माध्यम बताया था। रोहित के इस बयान के बाद टेलीविजन की दुनिया में बहस छिड़ गई थी।

अब संदीप ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि वह रोहित के इस्तेमाल किए गए शब्दों से बिल्कुल सहमत नहीं हैं, लेकिन वह यह जरूर समझते हैं कि अभिनेता आखिर कहना क्या चाह रहे थे। वह सीरियल्स की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा रहे थे।

संदीप सिकंद ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, ''मैं रोहित रॉय के इस्तेमाल किए गए शब्दों से बिल्कुल सहमत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि वह कहना यह चाह रहे थे कि आज जिस तरह के शोज बनाए जा रहे हैं, वे उस स्तर के नहीं हैं, जिस स्तर के होने चाहिए। इस भावना से मैं पूरी तरह सहमत हूं। मैं उनके शब्दों से बिल्कुल सहमत नहीं हूं लेकिन अगर उन्होंने इस माध्यम को 'कूड़ेदान' कहा है तो हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर टेलीविजन की हालत इतनी खराब क्यों हो गई है।''

संदीप ने कहा, ''टेलीविजन पर दिखाई जाने वाली चीजें अचानक नहीं बनी हैं, बल्कि इसके पीछे पूरा तंत्र काम करता है। जो शोज बनाए जा रहे हैं, जो सीरियल प्रसारित हो रहे हैं और जिन किरदारों को दर्शकों के सामने लाया जा रहा है, वे उसी व्यवस्था का नतीजा हैं, जिसे टेलीविजन की दुनिया ने मिलकर बनाया है।''

उन्होंने कहा, '''कूड़ेदान' शब्द निश्चित तौर पर सही नहीं है, लेकिन हिंदी टेलीविजन की मौजूदा स्थिति पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि टीवी की कहानी का स्तर लगातार गिर रहा है। इससे पहले कि स्थिति खराब हो जाए, हमें कहानी कहने के तरीके पर कुछ करना होगा।'

संदीप ने टीवी पर दूसरे भाषाई क्षेत्रों के शोज पर बढ़ती निर्भरता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा, ''दूसरे क्षेत्रों के लोकप्रिय शोज बार-बार हिंदी में बनाने के बजाय मौलिक कहानियों पर ध्यान देना जरूरी है। हर कहानी का दोबारा निर्माण नहीं किया जा सकता और एक समय ऐसा आएगा, जब नए विषयों की जरूरत महसूस होगी।''

रोहित रॉय ने हाल ही में टेलीविजन इंडस्ट्री को लेकर अपनी टिप्पणी से बहस छेड़ दी थी। एक बातचीत के दौरान उनसे पूछा गया था कि क्या टीवी की रचनात्मकता कम हो गई है। इस पर रोहित ने कहा था कि उनसे यह सवाल कई बार पूछा जा चुका है और कभी-कभी उन्हें डर लगता है कि उनकी बात कहीं एहसानफरामोश जैसी न लगे। उन्होंने टेलीविजन को 'डस्टबिन मीडियम' बताते हुए इसकी तुलना ऐसे अखबार से की, जिसे पढ़ने के बाद लोग जल्दी भूल जाते हैं।

--आईएएनएस

पीके/वीसी

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