महादेवी वर्मा की रचनाओं में थी वेदना और सौंदर्य की गहराई
नई दिल्ली, 25 मार्च (आईएएनएस)। 26 मार्च... सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के इतिहास का वो खास दिन है, जब एक ऐसी शख्सियत ने जन्म लिया, जिसने आगे चलकर अपनी कलम से शब्दों को कुछ यूं कागजों पर उकेरा कि वो आज भी लोगों के दिलों में बसी है। हम बात कर रहे हैं महादेवी वर्मा की। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में होली के दिन 1907 में जन्मी महादेवी वर्मा की रचनाओं में जो दर्द है, जो विरह है, जो आध्यात्मिक प्रेम है, वो सीधे दिल को छूता है और पाठक को भीतर तक महसूस होता है।
बचपन से ही महादेवी वर्मा का रुझान कला की तरफ था, फिर चाहे वो चित्रकला हो, संगीत हो या फिर कविता। बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था और छात्र जीवन में ही उनकी पहचान एक उभरती हुई कवयित्री के रूप में बनने लगी थी, लेकिन उनकी खास बात सिर्फ लिखना नहीं थी, बल्कि महसूस करना और उस एहसास को शब्दों में ढालना था। यही वजह है कि उनकी कविताएं पढ़ते वक्त ऐसा लगता है जैसे कोई अपनी ही कहानी कह रहा हो।
छायावाद युग की जब बात होती है तो चार बड़े नामों में महादेवी का भी नाम आता है। उनकी कविताओं में वेदना और सौंदर्य का एक अनोखा मेल देखने को मिलता है। वो दुख को भी इतनी खूबसूरती से लिखती थीं कि पढ़ने वाला भी उसे महसूस करता था।
उनकी काव्य भाषा भी बेहद खास थी। उन्होंने प्रतीकों और बिंबों का ऐसा प्रयोग किया कि हर पंक्ति में कई अर्थ छिपे रहते थे। चांद, बादल, रात, पवन ये सब उनके लिए सिर्फ प्रकृति के तत्व नहीं थे, बल्कि भावनाओं के प्रतीक थे। उनकी कविता 'नीर भरी दुख की बदली' इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जहां दर्द भी है और एक गहरी संवेदनशीलता भी।
महादेवी वर्मा सिर्फ कवयित्री ही नहीं थीं। वो एक मजबूत व्यक्तित्व भी थीं। उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति पर खुलकर लिखा और 'श्रृंखला की कड़ियां' जैसे निबंधों के जरिए महिलाओं की आवाज को सामने लाया। वो प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्य रहीं और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई। उस दौर में जब महिलाओं के लिए आगे बढ़ना आसान नहीं था, महादेवी ने अपनी राह खुद बनाई।
उनकी रचनाओं में इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों के प्रति भी गहरा प्रेम देखने को मिलता है। 'गिल्लू', 'नीलकंठ' जैसे रेखाचित्र आज भी पढ़ने वालों को भावुक कर देते हैं। इन कहानियों में उनका स्नेह, करुणा और संवेदनशीलता साफ झलकती है। वो हर जीव में एक आत्मा देखती थीं और यही सोच उनकी लेखनी को और भी खास बना देती है।
महादेवी वर्मा को उनके साहित्यिक योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे बड़े सम्मान मिले।
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