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हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल, समीक्षा को दिया नया शास्त्र

हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल, समीक्षा को दिया नया शास्त्र
हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल, समीक्षा को दिया नया शास्त्र

नई दिल्ली, 3 अक्टूबर (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य में अगर किसी एक व्यक्ति ने आलोचना, निबंध और इतिहास-लेखन तीनों को शिखर पर पहुंचाया तो वह नाम आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है। उनका जन्म 4 अक्टूबर 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना गांव में हुआ था। उनका निधन 1941 को हुआ, लेकिन 56 साल के छोटे से जीवन में उन्होंने जो काम किया, वह आज भी हिंदी साहित्य की धुरी बना हुआ है।

जब शुक्ल जी आठ वर्ष के थे, तब उनके पिता की नियुक्ति मिर्जापुर में सदर कानूनगो के रूप में हो गई। पिता के साथ वे मिर्जापुर आ गए। पिता चाहते थे कि वे उर्दू और अंग्रेजी पर ध्यान दें, लेकिन शुक्ल जी पिता की आंख बचाकर हिंदी पढ़ते रहे। उनका विद्यार्थी जीवन बहुत उज्ज्वल नहीं रहा, कई परीक्षाओं में वे असफल भी हुए। लेकिन परीक्षा की सफलता-असफलता से परे लगातार साहित्य, मनोविज्ञान और इतिहास के अध्ययन में लगे रहे।

मिर्जापुर में पं. केदारनाथ पाठक और भारतेन्दु युग के प्रसिद्ध साहित्यकार बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमधन' के संपर्क ने उनके अध्ययन को नई दिशा दी। यहीं उन्होंने हिंदी, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य का गहन अनुपालन शुरू किया, जो आगे चलकर उनके लेखन की नींव बना।

जीविका के लिए उन्होंने मिर्जापुर के एक कार्यालय में नौकरी की, लेकिन स्वाभिमानी स्वभाव के कारण हेड क्लर्क से नहीं पटी और नौकरी छोड़ दी। कुछ दिन मिशन स्कूल में ड्राइंग के अध्यापक रहे। 1909-10 के आसपास वे 'हिन्दी शब्द सागर' के संपादन में वैतनिक सहायक के रूप में काशी आए। इस कोश के प्रधान संपादक बाबू श्यामसुंदर दास थे।

1927 में इस कोश का काम पूरा हुआ, जिसकी लंबी भूमिका आचार्य शुक्ल ने लिखी। यही भूमिका बाद में परिवर्तित रूप में 'हिंदी साहित्य का इतिहास' के रूप में प्रकाशित हुई, जो आज भी हिंदी का सबसे प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ माना जाता है। उन्होंने 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का संपादन भी किया। बाद में उनकी नियुक्ति काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापक के रूप में हुई। कुछ समय अलवर में नौकरी की, पर रुचि का काम न होने से फिर काशी लौट आए। 1937 में वे बीएचयू के हिंदी विभागाध्यक्ष बने और इसी पद पर रहते हुए 1941 में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया।

शुक्ल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने लेख, गंभीर निबंध, कविताएं लिखीं। ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में फुटकर कविताएं लिखीं। एडविन आर्नल्ड के 'लाइट ऑफ एशिया' का 'बुद्धचरित' नाम से ब्रजभाषा में पद्यानुवाद किया। जोसेफ एडिसन के 'प्लेजर्स ऑफ इमेजिनेशन' का 'कल्पना का आनंद' और राखालदास बंद्योपाध्याय के 'शशांक' उपन्यास का हिंदी में अनुवाद किया। सैद्धांतिक समीक्षा पर लिखे उनके लेख मृत्यु के बाद 'रस मीमांसा' में संकलित हुए। तुलसी, सूर और जायसी पर लिखी उनकी लंबी समीक्षाएं 'त्रिवेणी' नाम से प्रकाशित हैं। दर्शन के क्षेत्र में 'विश्व प्रपंच' उनकी महत्वपूर्ण कृति है।

लेकिन उनका सबसे कालजयी रूप समीक्षक, निबंधकार और इतिहासकार का है। नलिन विलोचन शर्मा ने कहा था कि शुक्ल जी से बड़ा समीक्षक उस युग में किसी भी भारतीय भाषा में नहीं था। यह बात आज भी सत्य लगती है। समीक्षक के रूप में वे अब भी अपराजेय हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी अपनी पद्धति को युगानुकूल बनाना। रस और अलंकार का प्रयोग पहले भी होता था, लेकिन उन्होंने मनोविज्ञान के आलोक में और पाश्चात्य शैली पर उसकी ऐसी अभिनव व्याख्या की कि वे सिद्धांत बहिष्कृत होने से बच गए। उन्होंने आलोचना का ढांचा भारतीय रखा, पर रचना-विधान पश्चिम से लिया।

आलोचना में उन्होंने हमेशा लोक-संग्रह की भूमिका पर काव्य को परखा। उन्होंने काव्य को कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष रखते हुए 'भाव योग' कहा, जो मनुष्य के हृदय को मुक्तावस्था में पहुंचाता है। उन्होंने काव्य को 'सिद्धावस्था' और 'साधनावस्था' में विभाजित किया। साहित्यिक इतिहास लेखक के रूप में उन्होंने पहली बार केवल कवि-वृत्त-संग्रह से आगे बढ़कर साहित्य को 'शिक्षित जनता' से जोड़ा और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर काल-विभाजन और नामकरण किया। रामचंद्र शुक्ल हिंदी के पहले ऐसे आचार्य थे, जिन्होंने बिना किसी मोह के हर मत को अपने विवेक की कसौटी पर कसा। इसलिए वे आज भी हिंदी आलोचना के शिखर पर अकेले खड़े हैं।

--आईएएनएस

एससीएच/एबीएम

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