राजस्थान : 306 करोड़ रुपए से विकसित होंगे जनजातीय और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट
जयपुर, 10 अगस्त (आईएएनएस)। राजस्थान सरकार जनजातीय क्षेत्रों को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान दिलाने के लिए बड़े स्तर पर पर्यटन विकास कार्य कर रही है। इसके तहत प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, पारंपरिक हस्तशिल्प और लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ-साथ जनजातीय क्षेत्रों में 306 करोड़ रुपए से अधिक की पर्यटन परियोजनाएं लागू की जा रही हैं।
सरकार जनजातीय पर्यटन सर्किट और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट विकसित कर रही है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना है।
अधिकारियों के अनुसार, यह पहल केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और जनजातीय समुदायों की आजीविका सुधारने पर भी केंद्रित है।
प्रस्तावित जनजातीय पर्यटन सर्किट के तहत डूंगरपुर स्थित बेणेश्वर धाम, जिसे जनजातीय समुदाय का 'कुंभ' कहा जाता है, इसके विकास पर 49.40 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। वहीं, बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम के लिए 13.41 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं। इस सर्किट में चित्तौड़गढ़ का मातृकुंडिया, जिसे "मेवाड़ का प्रयाग" कहा जाता है, प्रतापगढ़ का सीतामाता अभयारण्य, बांसवाड़ा का त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, गौतमेश्वर महादेव मंदिर और उदयपुर का ऋषभदेव मंदिर भी शामिल होंगे।
राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए 206 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट विकसित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। यह सर्किट चावंड, हल्दीघाटी, गोगुंदा, कुंभलगढ़, दिवेर और उदयपुर जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों को जोड़ेगा।
इसके अलावा, डूंगरपुर में शिल्पग्राम और चित्तौड़गढ़ में हेरिटेज वॉकवे का निर्माण भी किया जाएगा। गोगुंदा की बाईजी की बावड़ी, उदयपुर के करणी माता मंदिर और नीमच माता मंदिर सहित कई धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण एवं विकास का कार्य भी प्रस्तावित है।
जनजातीय क्षेत्रों में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरकार विशेष कार्ययोजना पर काम कर रही है। इसके अंतर्गत 'सोंध माटी आदि धरोहर दस्तावेजीकरण योजना' चलाई जा रही है, जिसके जरिए जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रचार किया जाएगा। इसमें पारंपरिक वाद्य यंत्र, खानपान, चित्रकला, भित्ति चित्र, लकड़ी और पत्थर की कला, लोक नृत्य और संगीत को शामिल किया गया है।
सरकार 'बनफूल ट्राइबल डिजाइन स्टूडियो' और 'बनफूल' ब्रांडिंग पहल के माध्यम से जनजातीय कलाकारों को बाजार से जोड़ने और उनके पारंपरिक उत्पादों को पहचान दिलाने का काम भी कर रही है। कई जनजातीय आस्था स्थलों को भी पर्यटन विकास योजना में शामिल किया गया है। इनमें बारां का सीताबाड़ी, झाड़ोल के कमलनाथ महादेव और रामकुंडा महादेव मंदिर, उदयपुर का जावर माता मंदिर, सलूम्बर का सोनार माता मंदिर और बांसवाड़ा का सलाकेश्वर महादेव मंदिर शामिल हैं।
सरकार जनजातीय संस्कृति, जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान और जंगल एवं जल संसाधनों से उनके पारंपरिक संबंधों को दर्शाने वाली डॉक्यूमेंट्री भी तैयार करेगी। ये फिल्में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रदर्शित की जाएंगी।
अधिकारियों का कहना है कि 'टूरिज्म इन ट्राइब्स' पहल को केवल पर्यटन कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण और सांस्कृतिक गौरव से जुड़े अभियान के रूप में विकसित किया जा रहा है। इससे जनजातीय क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या बढ़ने, उनके ठहराव की अवधि लंबी होने और स्थानीय निवासियों, कारीगरों तथा स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
सरकार को विश्वास है कि आने वाले समय में राजस्थान के जनजातीय क्षेत्र घरेलू और विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षक पर्यटन केंद्र बनेंगे और इससे स्थानीय समुदायों के साथ-साथ राज्य की अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा।
--आईएएनएस
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