स्थिरता के दावों के बीच संकट में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था : रिपोर्ट
नई दिल्ली, 18 मार्च (आईएएनएस)। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार भले ही स्थिरता और सुधार के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि गहरी जड़ें जमा चुकी संरचनात्मक कमजोरियां खासतौर पर उत्पादन आधार का लगातार कमजोर होना देश की आर्थिक स्थिति को अब भी प्रभावित कर रहा है।
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने डिफॉल्ट से बचने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि व्यापक अर्थव्यवस्था अब भी नाजुक बनी हुई है और स्थायी सुधार के स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहे हैं।
मुख्य आर्थिक संकेतक लगातार दबाव की ओर इशारा करते हैं, जिनमें धीमी आर्थिक वृद्धि, ऊंची महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी और बढ़ता कर्ज शामिल हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे बड़ी समस्या कमजोर उत्पादन क्षमता है, जो देश की टिकाऊ आर्थिक वृद्धि को सीमित कर रही है।
पाकिस्तान की उत्पादन प्रणाली वर्षों से नीतिगत उपेक्षा और कमजोर शासन के कारण लगातार कमजोर होती गई है। आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ माने जाने वाले औद्योगिक और कृषि उत्पादन में या तो ठहराव आ गया है या उनमें गिरावट आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में डेटा संशोधन में औद्योगिक क्षेत्र का जीडीपी में हिस्सा 20.9 प्रतिशत से घटकर 19.5 प्रतिशत हो गया, जो संरचनात्मक गिरावट को दर्शाता है।
बड़े पैमाने का विनिर्माण क्षेत्र अब भी संघर्ष कर रहा है, जबकि कृषि क्षेत्र बढ़ती लागत, गिरती कीमतों और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। कमजोर नीतिगत समर्थन ने किसानों पर अतिरिक्त दबाव डाला है, जिससे कई क्षेत्रों में गरीबी बढ़ी है।
कमजोर उत्पादन आधार ने बाहरी असंतुलन को भी बढ़ाया है। सीमित निर्यात क्षमता और आयात पर बढ़ती निर्भरता ने विदेशी मुद्रा भंडार को कमजोर किया है, जिससे देश को बार-बार कर्ज लेना पड़ रहा है। पिछले दो दशकों में सार्वजनिक कर्ज तेजी से बढ़ा है, जिससे उसकी स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
मुद्रा के अवमूल्यन ने इन समस्याओं को गंभीर बना दिया है, जिससे महंगाई बढ़ी है और लोगों की क्रय शक्ति कम हुई है, परिणामस्वरूप आर्थिक कठिनाइयां बढ़ी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक संकट अब सामाजिक ढांचे को भी प्रभावित कर रहा है। बढ़ती गरीबी, खाद्य असुरक्षा और असमानता समाज में विभाजन को बढ़ा रही है और अस्थिरता का खतरा बढ़ा रही है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार की ओर से समर्थित पहल, जैसे कि 'स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल' (एसआईएफसी), अब तक ठोस परिणाम देने में विफल रही हैं, जिससे उनकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
विश्लेषकों का तर्क है कि सब्सिडी, कल्याणकारी खर्च और संपत्तियों की बिक्री जैसे अल्पकालिक उपायों पर लगातार निर्भरता ने मूल समस्याओं को हल करने के बजाय आर्थिक ढांचे को और कमजोर किया है। उनका कहना है कि यदि उत्पादन क्षमता को पुनर्निर्मित करने, शासन में सुधार और कारोबारी माहौल को मजबूत करने के लिए तुरंत और व्यापक सुधार नहीं किए गए, तो पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियां और गहरी हो सकती हैं।
--आईएएनएस
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