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पाकिस्तान की संघीय संवैधानिक अदालत ने अहमदिया समुदाय के प्रकाशन पर बरकरार रखा प्रतिबंध

पाकिस्तान की संघीय संवैधानिक अदालत ने अहमदिया समुदाय के प्रकाशन पर बरकरार रखा प्रतिबंध
पाकिस्तान की संघीय संवैधानिक अदालत ने अहमदिया समुदाय के प्रकाशन पर बरकरार रखा प्रतिबंध

इस्लामाबाद, 11 सितंबर (आईएएनएस) । पाकिस्तान की फेडरल कॉन्स्टीट्यूशनल कोर्ट (एफसीसी) ने अल्पसंख्यक अहमदिया समुदाय के 23 खंडों वाले एक प्रकाशन पर पंजाब सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को बरकरार रखा है। अदालत की खंडपीठ ने इस प्रतिबंध के खिलाफ अहमदिया समुदाय द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया।

अहमदिया समुदाय ने लाहौर हाईकोर्ट और उसकी मुल्तान पीठ के फैसलों को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। निचली अदालतों ने याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दी थीं कि उनमें काफी देरी हुई थी और निर्धारित समय सीमा के भीतर उपलब्ध कानूनी उपायों का उपयोग नहीं किया गया था।

याचिकाओं में अहमदिया समुदाय ने कहा था कि पंजाब सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

एफसीसी ने कहा कि यह तय करने के लिए कि अनुच्छेद 20 का उल्लंघन हुआ है या नहीं, प्रतिबंध और जब्ती के आदेशों की वैधता, आधार और तर्कों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित प्रकाशनों की सामग्री अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं की, इसलिए याचिकाएं खारिज की जाती हैं।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकील की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने प्रकाशन की वास्तविक सामग्री और उसके कथित प्रभाव को स्पष्ट करने के बजाय मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता पर सामान्य तर्क दिए।

न्यायाधीशों ने कहा कि कार्यपालिका द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का दावा बाद में जोड़ा गया तर्क प्रतीत होता है और यह अनुच्छेद 20 तथा मौलिक अधिकारों पर सामान्य चर्चा भर है।

अदालत ने कहा कि प्रक्रियागत कमियों और आवश्यक सामग्री के अभाव में वह याचिकाकर्ताओं की मांग के अनुरूप संवैधानिक प्रश्न पर निर्णय देने में सक्षम नहीं है।

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने 7 सितंबर को पाकिस्तान में अहमदिया मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जारी भेदभाव, हिंसा और कानूनी प्रतिबंधों पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने पाकिस्तान सरकार से समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं का पालन करने का आह्वान किया था।

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने कहा था, "हमें लगातार मिल रही रिपोर्टों से गहरी चिंता है कि अहमदिया समुदाय के सदस्य अपनी धार्मिक पहचान के कारण उत्पीड़न, आपराधिक मुकदमों, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे हैं।"

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अंतरात्मा, धर्म और आस्था की स्वतंत्रता का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति को भेदभाव, धमकी या हिंसा का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए और न ही उसे अपने धर्म का शांतिपूर्ण पालन करने से रोका जाना चाहिए।

विशेषज्ञों ने अहमदिया समुदाय के पूजा स्थलों पर हमलों, कब्रों के अपमान और ईद-उल-फितर तथा ईद-उल-अजहा जैसे धार्मिक आयोजनों में बाधा डालने की घटनाओं का भी उल्लेख किया।

उन्होंने धार्मिक पहचान और आस्था से जुड़े मामलों में अहमदिया समुदाय के लोगों की गिरफ्तारी और मुकदमों के साथ-साथ उनके खिलाफ घृणास्पद भाषणों पर भी चिंता जताई।

विशेषज्ञों ने पाकिस्तान में हिंसा रोकने, जवाबदेही तय करने और कमजोर समुदायों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया।

उन्होंने कहा, "राज्य की जिम्मेदारी है कि वह मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने के लिए उचित सावधानी बरते, आरोपों की निष्पक्ष जांच करे, दोषियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कार्रवाई करे और पीड़ितों को प्रभावी न्याय उपलब्ध कराए।"

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को उस दंडहीनता की प्रवृत्ति को समाप्त करना होगा, जिसने घृणा और हिंसा भड़काने वालों को बिना रोक-टोक काम करने का अवसर दिया है।

--आईएएनएस

एएमटी/डीकेपी

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