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फ्लाईदुबई एफजेड1073 हमले पर चुप्पी को लेकर पाकिस्तान और तुर्की भी सवालों के घेरे में

फ्लाईदुबई एफजेड1073 हमले पर चुप्पी को लेकर पाकिस्तान और तुर्की भी सवालों के घेरे में
फ्लाईदुबई एफजेड1073 हमले पर चुप्पी को लेकर पाकिस्तान और तुर्की भी सवालों के घेरे में

तेल अवीव, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। सऊदी अरब की "हर तरह से" रक्षा करने के पाकिस्तान के वादे और सऊदी अरब पर हुए किसी भी सशस्त्र हमले को खुद पर हमला मानने की तुर्की की प्रतिबद्धता के बावजूद, इनमें से किसी भी सहयोगी देश ने उस हिंसक हमले की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की है, जिसमें एक नागरिक विमान आसमान से नीचे गिरकर सऊदी अरब में उतरा था और उसमें सवार यात्री बुरी तरह डरे हुए थे और कैप्टन घायल था।

इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने ‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ में लिखा, “कुछ पल ऐसे होते हैं जब चुप्पी ही कूटनीति होती है, कुछ ऐसे भी होते हैं जब चुप्पी एक राजनीतिक बयान बन जाती है। फ्लाईदुबई की फ्लाइट एफजेड1073 के मामले में किसी भी सरकार के लिए सबसे आसान बयान देना मुमकिन था। दुबई से तेल अवीव जा रहे इस विमान में 170 से ज्यादा लोग सवार थे। कॉकपिट में को-पायलट द्वारा कैप्टन पर कथित हमले के बाद विमान एक डरावनी इमरजेंसी की स्थिति में आ गया था।”

उन्होंने आगे कहा, “इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के अनुसार, यात्रियों और क्रू के दखल देने से पहले विमान तीस सेकंड से भी कम समय में लगभग 14,000 फीट नीचे गिर गया था। आखिरकार यह सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतरा।”

रेस्टेली के अनुसार, इस घटना की निंदा न करना इसलिए भी खास तौर पर ध्यान देने लायक है क्योंकि पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का समझौते का मकसद सिर्फ एक और क्षेत्रीय बयान जारी करना नहीं था।

उन्होंने कहा, “जाहिर है, जब हमलावर राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो, तो सामूहिक सुरक्षा की बात करना आसान होता है। एफजेड1073 एक कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा पेश करता है। यह विमान एक अमीराती एयरलाइन का था। इसकी मंजिल इजरायल थी। इसके कई यात्री इजरायली थे। अपने विमान को बचाने के लिए लड़ने वाले कैप्टन भारतीय थे। कथित हमलावर ओमान का था। और आखिरकार विमान ने सऊदी अरब में शरण ली।”

विशेषज्ञ ने कहा कि नागरिक विमान को नष्ट करने की कोशिश की निंदा करने का मतलब इजरायल को मान्यता देना, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का समर्थन करना या फिलस्तीन का समर्थन छोड़ना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे सिर्फ आतंकवाद को नकारने के तौर पर देखा जाना चाहिए।

रेस्टेली ने जोर दिया कि किसी गठबंधन की असली परीक्षा तब नहीं होती जब उसके सदस्य इस बात पर सहमत हों कि दुश्मन कौन है, बल्कि तब होती है जब सिद्धांतों पर कायम रहना मुश्किल हो जाता है।

इस बात पर जोर देते हुए कि सऊदी अरब को एक बुनियादी बात ध्यान में रखनी चाहिए, उन्होंने कहा कि यह देश सिर्फ सुरक्षा गारंटी चाहने वाला कोई आम देश नहीं है।

रेस्टेली ने विस्तार से बताया, “यह इस्लाम की दो सबसे पवित्र मस्जिदों का संरक्षक है और तेजी से खुद को आधुनिक होते मुस्लिम जगत के राजनीतिक केंद्र के तौर पर पेश कर रहा है। इसलिए, मक्का के नाम वाला गठबंधन सामान्य रक्षा सहयोग से कहीं ज्यादा नैतिक महत्व रखता है।”

उन्होंने कहा, "अगर मक्का समझौते का मकसद सुरक्षा का एक गंभीर और नया ढांचा तैयार करना है, तो इसके सदस्य आतंकवाद की अपनी परिभाषा को पीड़ितों की राष्ट्रीयता, विमान के गंतव्य या उस समय की कूटनीतिक संवेदनशीलता के आधार पर बदलने की इजाजत नहीं दे सकते।"

--आईएएनएस

केआर/

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