Samachar Nama
×

पाकिस्तान: पांच साल में दर्ज हुए 333 ईशनिंदा केस, अधिकतर निकले फर्जी

पाकिस्तान: पांच साल में दर्ज हुए 333 ईशनिंदा केस, अधिकतर निकले फर्जी
पाकिस्तान: पांच साल में दर्ज हुए 333 ईशनिंदा केस, अधिकतर निकले फर्जी

इस्लामाबाद, 27 जुलाई (आईएएनएस)। पाकिस्तान में अधिकारियों ने हाल ही में एक संसदीय समिति को बताया कि देश के चार प्रांतों में पिछले पांच वर्षों के दौरान दर्ज किए गए 333 ईशनिंदा मामलों में से अधिकतर झूठे पाए गए हैं।

प्रांतीय गृह सचिवों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने सीनेट की मानवाधिकार संबंधी कार्यात्मक समिति को जानकारी दी कि इन झूठे मामलों में ईसाइयों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े मामले भी शामिल थे।

समिति के सामने पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ईशनिंदा कानून की धारा 295-सी के तहत सबसे अधिक मामले पंजाब प्रांत में दर्ज किए गए। पिछले पांच वर्षों में यहां इस धारा के तहत 116 मामले दर्ज हुए।

क्रिश्चियन डेली 'इंटरनेशनल-मॉर्निंग स्टार न्यूज' की रिपोर्ट के अनुसार, सिंध प्रांत में धारा 295-बी के तहत 96 मामले, जबकि धारा 295-सी के तहत 29 मामले दर्ज किए गए। खैबर पख्तूनख्वा में पिछले पांच वर्षों में 90 से अधिक ईशनिंदा मामले सामने आए, वहीं बलूचिस्तान में इसी अवधि में 28 मामले दर्ज किए गए।

प्रांतीय अधिकारियों ने समिति को बताया कि ईशनिंदा के आरोप अक्सर व्यक्तिगत दुश्मनी, पारिवारिक विवाद और अन्य निजी झगड़ों से जुड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि कई मामलों में जांच के दौरान आरोपों को साबित करने वाला कोई सबूत नहीं मिला, जिसके बाद मामलों को खारिज कर दिया गया।

पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों की मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा लंबे समय से आलोचना की जाती रही है। उनका कहना है कि इन कानूनों का इस्तेमाल अक्सर व्यक्तिगत बदला लेने, संपत्ति पर कब्जा करने और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।

22 जुलाई को एक प्रमुख अल्पसंख्यक अधिकार संगठन ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग को रोकने में विफल रहा है। संगठन ने झूठे आरोपों, आरोपियों के खिलाफ भीड़ की हिंसा और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में नाकामी का हवाला दिया था।

वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) के अनुसार, ईशनिंदा कानून पाकिस्तान के सबसे "विवादास्पद मुद्दों" में से एक बने हुए हैं। संगठन ने कहा कि इनका सबसे अधिक प्रभाव धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ता है और संस्थाएं इनके दुरुपयोग को रोकने में लगातार नाकाम रही हैं।

मानवाधिकार संगठन ने कहा कि पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक यह है कि वह निर्दोष लोगों को झूठे आरोपों से बचाने में सफल नहीं रही है।

वीओपीएम ने पाकिस्तान की ईसाई लड़की रिम्शा मसीह मामले का जिक्र करते हुए कहा कि इस घटना ने व्यवस्था की गंभीर कमजोरियों को उजागर किया था। रिम्शा पर कुरान के अपमान का आरोप लगाया गया था, लेकिन बाद में सामने आए सबूतों से संकेत मिला कि आरोप "गढ़े हुए" थे।

हालांकि बाद में उसे रिहा कर दिया गया, लेकिन संगठन के अनुसार तब तक काफी नुकसान हो चुका था। उसके परिवार को भारी दबाव का सामना करना पड़ा, और यह मामला दिखाता है कि अदालत द्वारा तथ्यों की जांच से पहले ही कोई व्यक्ति कितनी आसानी से पीड़ित बन सकता है।

वीओपीएम ने कहा, "न्यायपालिका और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की बार-बार आलोचना हुई है कि वे ईशनिंदा के आरोपों का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में विफल रही हैं। जब झूठे आरोप लगाने वालों या धार्मिक भावनाओं का गलत इस्तेमाल करने वालों को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, तो यह खतरनाक संदेश जाता है कि ऐसे काम बिना परिणाम के जारी रह सकते हैं। इससे कानूनी व्यवस्था में लोगों का भरोसा कमजोर होता है।"

--आईएएनएस

केआर/

Share this story

Tags