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नोएडा के बिसरख गांव में रावण जलाए नहीं जाते, ग्रामीण करते हैं पूजा

नोएडा के बिसरख गांव में रावण जलाए नहीं जाते, ग्रामीण करते हैं पूजा
नोएडा के बिसरख गांव में रावण जलाए नहीं जाते, ग्रामीण करते हैं पूजा

ग्रेटर नोएडा, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। पूरे भारत में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाकर दशहरा मनाया जाता है लेकिन उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा स्थित बिसरख गांव में एक अलग ही परंपरा है, जहां रावण की पूजा की जाती है।

राष्ट्रीय राजधानी से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव, हिंदू महाकाव्य रामायण के राक्षस राजा रावण की जन्मस्थली माना जाता है।

देश के अन्य हिस्सों के विपरीत, यहां के निवासी रावण का पुतला नहीं जलाते, क्योंकि वे ऐसा करना अपने पूर्वजों का अपमान मानते हैं। इसके बजाय, श्रद्धालु रावण की पूजा-अर्चना करते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

आईएएनएस से ​​बात करते हुए, महंत रामदास महाराज ने बताया कि स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में इस गांव का एक विशेष स्थान है और यह ऋषि ब्रह्मा तथा ऋषि पुलस्त्य से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा कि यह रावण की जन्मस्थली है और कभी यहां ऋषि ब्रह्मा और ऋषि पुलस्त्य का आश्रम हुआ करता था। यहां साल भर रोज रावण की पूजा की जाती है। आज दशहरा है, और यहां एक 'यज्ञ' किया जा रहा है। मंदिर को बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया है और रावण के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जा रही हैं।

उन्होंने आगे बताया कि इस अवसर पर कई इलाकों से लोग यहां आते हैं और रावण को फूल व मिठाइयां अर्पित करते हैं। दिन भर धार्मिक अनुष्ठान, जैसे 'हवन' आदि किए जाते हैं, जो शाम तक चलते हैं।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, बिसरख को पहले 'विश्वेश्वर' के नाम से जाना जाता था, जो रावण के पिता 'विश्रवा' से जुड़ा नाम है। माना जाता है कि त्रेता युग में ऋषि विश्रवा का जन्म इसी गांव में हुआ था और उन्होंने यहां एक शिवलिंग स्थापित किया था। भगवान शिव के भक्त रावण ने भी संभवतः इसी स्थान पर पूजा की थी।

सोशल मीडिया पर मंदिर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है, जिससे देश भर से लोग यहां आ रहे हैं और इस गांव में मनाए जाने वाले अनोखे दशहरे को देख रहे हैं।

बिसरख ही एकमात्र ऐसी जगह नहीं है जहां रावण को धार्मिक सम्मान दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में भी एक मंदिर है जहां एक अलग परंपरा का पालन किया जाता है; यहां श्रद्धालु रावण के विनाश का जश्न मनाने के बजाय, दस सिरों वाले इस राजा की पूजा करते हैं।

कानपुर के शिवाला इलाके में कैलाश मंदिर परिसर के भीतर स्थित 'दशानन मंदिर' अपनी एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है, यहां के दरवाजे साल में केवल एक बार, विजयादशमी के दिन ही खोले जाते हैं। बाकी 364 दिन यह मंदिर बंद रहता है।

आईएएनएस से ​​बात करते हुए, मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी ने बताया कि इस मंदिर का निर्माण 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ला ने करवाया था। दशहरा के दिन सुबह मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, जिसके बाद रावण की प्रतिमा को दूध और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-पाठ और आरती की जाती है।

इस मंदिर की अनोखी परंपरा इस मान्यता पर आधारित है कि रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे एक अत्यंत विद्वान, बुद्धिमान शासक और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

विजयदशमी के दिन भक्त यहां आशीर्वाद लेने आते हैं और प्रार्थना करते हैं, साथ ही फूल और तेल के दीपक अर्पित करते हैं। हर साल जब मंदिर के दरवाजे खुलते हैं, तो यहां ऐसे लोग आते हैं जो रावण के विद्वतापूर्ण गुणों और भगवान शिव के प्रति उनकी भक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करना चाहते हैं।

इसी तरह, जहां पूरे देश में दशहरा का त्योहार रावण के पुतले जलाने के साथ संपन्न होता है, वहीं मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का एक गांव इस त्योहार को अलग ढंग से मनाता है। यहां लंकापति रावण को 'रावण बाबा' के रूप में पूजा जाता है और उन्हें गांव का मुख्य देवता माना जाता है।

रावण मंदिर के पुजारी पंडित नरेश तिवारी ने आईएएनएस को बताया कि ग्रामीणों का मानना ​​है कि 'रावण बाबा' पूरे समुदाय की रक्षा करते हैं और किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके आशीर्वाद से ही होनी चाहिए।

विदिशा की नटेरन तहसील में स्थित 'रावण' गांव में एक प्राचीन मंदिर है, जिसके बारे में स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि यह परमार काल का है। इस मंदिर में रावण की 12 फुट लंबी लेटी हुई प्रतिमा है, जहां रोजाना पूजा और आरती होती है। दशहरा पर रावण का पुतला जलाने के बजाय, ग्रामीण यहां रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और एक बड़े सामुदायिक भोज का आयोजन करते हैं। इसमें विदिशा, भोपाल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं।

पंडित तिवारी ने कहा कि हमारे गाँव का नाम 'रावण' है और यहां रावण महाराज की प्रतिमा स्थापित है। रावण बाबा महाराज यहां विराजमान हैं और हमारा पूरा गांव उनकी शरण में है। हमारे सभी काम उन्हीं की कृपा से पूरे होते हैं। पुजारी ने बताया कि ग्रामीण शादियों, शादी से जुड़ी रस्मों, भागवत कीर्तन और रामायण पाठ से पहले देवता का आशीर्वाद लेते हैं। उनके अनुसार, किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले देवता का आशीर्वाद न लेने से काम में बाधाएं आ सकती हैं।

--आईएएनएस

डीकेएम/पीएम

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