नेपाल: पूर्व राजा ज्ञानेंद्र ने ‘असंतुलित’ विदेश नीति को लेकर राजनीतिक नेतृत्व पर साधा निशाना
काठमांडू, 10 जनवरी (आईएएनएस)। नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने शनिवार को देश के राजनीतिक नेतृत्व पर तेजी से असंतुलित होती विदेश नीति और आचरण अपनाने का आरोप लगाया, जिससे राष्ट्रीय हितों को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।
आधुनिक नेपाल के संस्थापक और अपने पूर्वज पृथ्वी नारायण शाह की 304वीं जयंती तथा राष्ट्रीय एकता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में पूर्व सम्राट ने कहा कि नेतृत्व देश की संवेदनशील स्थिति और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य को समझने में विफल रहा है। इसके कारण नेपाल ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां मित्र राष्ट्रों का भरोसा और विश्वास खोने का खतरा पैदा हो गया है।
वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, “ऐसे समय में जब असंतुलित विदेश नीति और आचरण राष्ट्रीय हितों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं, स्वर्गीय पृथ्वी नारायण शाह के दिव्य उपदेश और उनके बौद्धिक दृष्टिकोण का महत्व और बढ़ गया है।” हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि देश की विदेश नीति किस तरह असंतुलित हुई है।
पूर्व राजा ने यह भी कहा कि नेपाल को अपनी रक्षा के लिए “शांति की ढाल” अपनानी चाहिए, भले ही कई देश किसी न किसी प्रकार की सुरक्षा ढाल के सहारे संरक्षण चाहते हों। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि “शांति की ढाल” से उनका क्या आशय है।
अपने संदेश में उन्होंने युवाओं में बढ़ती निराशा और देश से हो रहे पलायन पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मानव संसाधनों के निरंतर पलायन से देश के भविष्य को लेकर पहले ही निराशा के संकेत मिल रहे थे और अब पूंजी, पूंजीपतियों तथा साहसी उद्यमियों का भी देश से बाहर जाना शुरू हो गया है।
उन्होंने कहा, “यदि इस प्रवृत्ति को तुरंत नहीं रोका गया तो देश विफलता के कगार पर खड़ा हो सकता है, यह सोचकर हमें गहरी पीड़ा होती है।”
हालांकि उन्होंने हालिया जेन-ज़ी आंदोलन का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया, लेकिन युवाओं में बढ़ती विद्रोही भावना की ओर इशारा किया। पिछले साल सितंबर की शुरुआत में हुए जेन-ज़ी आंदोलन के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार गिर गई थी, जिसके बाद वर्तमान में सुषिला कार्की के नेतृत्व में सरकार बनी।
पूर्व राजा ने कहा, “जब भी युवा पीढ़ी की भावनाओं, आकांक्षाओं और जरूरतों को नजरअंदाज किया जाता है, तो असंतोष पैदा होना तय है और वह विद्रोह का रूप भी ले सकता है। नेतृत्व को इस सच्चाई को आत्मसात करना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं की जरूरतों को समझे बिना केवल उनका इस्तेमाल किए जाने से निराशा बढ़ी है और देश में जान-माल का नुकसान हुआ है।
नेपाली सरकार के अनुसार, जेन-ज़ी प्रदर्शनों के दौरान 77 लोगों की जान गई और 84 अरब नेपाली रुपये से अधिक की सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा।
पूर्व सम्राट ने करीब दो दशक पहले राजमहल छोड़ने की भी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि उन्होंने “राजमुकुट और राजदंड”, यानी जनता का विश्वास, जनता को सुरक्षित संरक्षण के लिए सौंप दिया था और राजनीतिक दलों की इच्छा के अनुसार राज्य मामलों से स्वयं को दूर रखा, जिन्होंने शांति, आर्थिक प्रगति और स्थिरता का वादा किया था।
उन्होंने कहा, “नारायणहिटी राजमहल छोड़ने के लगभग दो दशक बाद भी देश के सामने लगातार खड़ी हो रही संकट की स्थिति ने हमें गहराई से चिंतित किया है। पहले चिंता थी कि राष्ट्र का निर्माण नहीं हो रहा है, अब निराशा इस बात की है कि कहीं राष्ट्र का अस्तित्व ही खतरे में न पड़ जाए।”
--आईएएनएस
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