नवी पिल्ले को नोबेल सम्मान मिलने से तमिलनाडु के पैतृक गांव वट्टलगुंडु में खुशी की लहर, परिवार ने जताया गर्व
चेन्नई, 14 अक्टूबर (आईएएनएस)। दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवनेथम "नवी" पिल्ले को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की खबर से तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले के पझैया वट्टलगुंडु में उनके रिश्तेदारों के बीच जश्न का माहौल है, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
इस सम्मान ने परिवार के लिए उनके पूर्वजों के पलायन और लगभग दो दशक पहले हुए पुनर्मिलन की यादें ताजा कर दी हैं। रिश्तेदारों का कहना है कि पिल्लई के पूर्वज 1890 में रोजगार की तलाश में दक्षिण अफ्रीका जाने से पहले श्रीलंका चले गए थे।
रिश्तेदार मुथुमणि ने बताया कि पिल्लई उनके दादाजी के बड़े भाई की बेटी थीं। पीढ़ियों तक विदेश में रहने के बावजूद परिवार ने पजहया वट्टलागुंडू (जिसे बटलागुंडू भी कहा जाता है) से अपना जुड़ाव बनाए रखा।
उन्होंने कहा, "उन्होंने कानून की पढ़ाई की, कई चुनौतियों का सामना किया और बड़ी सफलता हासिल की, जिससे हमारे पूरे परिवार का मान बढ़ा है।" उन्होंने उनके अच्छे स्वास्थ्य और निरंतर सफलता की कामना की।
नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद 2007 में पिल्लई की इस शहर की यात्रा के दौरान ली गई तस्वीरों में भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है।
रिश्तेदारों के अनुसार, पजहया वट्टलागुंडू में परिवार के सदस्यों से मिलने से पहले उन्होंने अपने पिता की मृत्यु के बाद धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए रामेश्वरम की यात्रा की थी।
पिल्लई को अपनी आंटी मानने वाली तिरुपति ने कहा कि रामेश्वरम की यात्रा के समय वे बहुत छोटे थे, लेकिन उन्हें परिवार की वे तस्वीरें आज भी बहुत प्यारी हैं। वे यहां आईं, सबका हाल-चाल पूछा और जितनी हो सकी, उतनी मदद की।"
तिरुपति ने कहा कि इस अवॉर्ड से परिवार को खुशी और गर्व महसूस हुआ है। रिश्तेदारों का कहना है कि उनकी कामयाबी ने उन यादों को और भी खास बना दिया है।
23 सितंबर 1941 को डरबन में जन्मीं पिल्लई गरीबी और रंगभेद के भेदभाव का सामना करते हुए बड़ी हुईं। उन्होंने नटाल यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की और 1988 में हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। उनके करियर में रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं का पक्ष रखना और 1995 में दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में नियुक्त होने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनना शामिल है।
इसके बाद उन्होंने रवांडा के लिए इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल और यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स के तौर पर काम किया।
रवांडा ट्रिब्यूनल में उन्होंने 1998 के ऐतिहासिक अकायेसु फैसले को सुनाने में मदद की, जिसमें यह माना गया कि कुछ खास हालात में रेप और यौन हिंसा नरसंहार (जेनोसाइड) के दायरे में आ सकते हैं। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने की उनकी कोशिशों के लिए उन्हें सम्मानित किया।
डिंडिगुल में रहने वाले पिल्लई के रिश्तेदारों के लिए उस वैश्विक पहचान का बहुत निजी महत्व है। कहानियों और तस्वीरों के जरिए बना पारिवारिक जुड़ाव अब उनके पुश्तैनी शहर और व्यापक तमिल समुदाय के लिए गर्व का स्रोत बन गया है।
--आईएएनएस
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