मध्य प्रदेश: नर्मदा को बचाने की पहल, एसएचजी ने शुरू किया बायोडिग्रेडेबल दीयों का निर्माण
खंडवा, 24 अप्रैल (आईएएनएस) । मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने के लिए महिला नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूह ने राज्य सरकार की मदद से नर्मदा नदी में प्लास्टिक सामग्री के विकल्प के रूप में बायोडिग्रेडेबल 'आटे के दीये' बनाना शुरू किया है।
इस पहल से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण रोजगार को भी बढ़ावा मिल रहा है।
खंडवा में ओंकारेश्वर के पास काम करने वाले 'मां नर्मदा आजीविका स्वयं सहायता समूह' ने राज्य सरकार के पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग से 'ग्रामीण आजीविका मिशन' के तहत 1.5 लाख रुपए की आर्थिक मदद लेकर यह काम शुरू किया है।
एक सरकारी बयान के मुताबिक, इस पहल का मकसद 'दीपदान' जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पैदा होने वाले बढ़ते प्लास्टिक कचरे की समस्या को हल करना है। प्लास्टिक के दीये और बर्तन अक्सर नदी में फेंक दिए जाते हैं, जिससे पानी प्रदूषित होता है और जलीय जीवों की जान को खतरा पैदा हो जाता है। इसके उलट, आटे के दीये पानी में अपने आप घुल जाते हैं और पीछे कोई भी नुकसानदायक अवशेष नहीं छोड़ते।
सरकार ने कहा कि धार्मिक गतिविधियों में प्लास्टिक कचरे को कम करना नर्मदा नदी को बचाने के लिए बहुत जरूरी है। आटे के दीयों जैसे विकल्पों को बढ़ावा देकर, हम नदी संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए स्थायी आजीविका सुनिश्चित करने में भी मदद कर रहे हैं।
सरकार ने आगे बताया कि 'ग्रामीण आजीविका मिशन' इस एसएचजी को ट्रेनिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने में भी मदद कर रहा है, ताकि यह काम लगातार चलता रहे।
बयान में कहा गया है कि ये दीये मोरटक्का के खेड़ीघाट पर फूलों की दुकानों और किराने की दुकानों पर बेचे जा रहे हैं, जिससे मंदिर नगरी में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए इन्हें खरीदना आसान हो गया है।
स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष विजया जोशी ने बताया कि नदी पर प्लास्टिक कचरे के बुरे असर को देखने के बाद ही समूह ने यह काम शुरू करने का फैसला किया।
उन्होंने कहा कि हमने देखा कि प्लास्टिक की चीजें मां नर्मदा को नुकसान पहुंचा रही थीं और मछलियों पर भी बुरा असर डाल रही थीं। हमारे आटे के दीये पानी में घुल जाते हैं और पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं। साथ ही, इनसे हमें नियमित रूप से कुछ आमदनी भी हो जाती है।
उन्होंने आगे बताया कि श्रद्धालुओं की तरफ से इस पहल को बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला है, क्योंकि प्राकृतिक चीजों से बनी भेंट चढ़ाना हमारी पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मिट्टी या आटे से बने दीयों में 'दीपदान' करने का विशेष पुण्य मिलता है।
राज्य सरकार ने इस परियोजना को नर्मदा नदी के किनारे बसे अन्य तीर्थस्थलों के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बताया है। सरकार का कहना है कि इस मॉडल में आजीविका सृजन को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ने की अपार क्षमता है।
--आईएएनएस
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