जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रों ने ऑनलाइन कक्षाओं का किया बहिष्कार, कैंपस और ऑफलाइन पढ़ाई बहाल करने की मांग
नई दिल्ली, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के 'सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज' और 'समाजशास्त्र विभाग' (डिपार्टमेंट ऑफ सोशियोलॉजी) के छात्रों ने गुरुवार को विश्वविद्यालय की ऑनलाइन कक्षाओं के आदेश का 'पूर्ण बहिष्कार' किया। उन्होंने 'शैक्षणिक प्रगति और शोध कार्य में बाधा' का हवाला देते हुए परिसर में कक्षाओं को तत्काल बहाल करने की मांग की।
यह ऐसे समय में हुआ है, जब जामिया मिलिया इस्लामिया छात्र संघ (जेएमआईएसयू) की बहाली और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई के विरोध में विश्वविद्यालय के मुख्य निरीक्षक को हटाने की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन गुरुवार को 18वें दिन में प्रवेश कर गए।
एक आधिकारिक बयान में 'सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज' (सीडब्ल्यूएस) के छात्रों ने गुरुवार को विश्वविद्यालय के उस आदेश का पूर्ण विरोध किया, जिसमें चल रही ऑनलाइन कक्षाओं को 24 नवंबर तक बढ़ाने का निर्देश दिया गया था और यह घोषणा की गई थी कि विषम सेमेस्टर के छात्रों की सभी व्यावहारिक और सैद्धांतिक परीक्षाएं ऑनलाइन माध्यम से आयोजित की जाएंगी, क्योंकि परिसर में स्थिति शैक्षणिक वातावरण के लिए 'अनुकूल नहीं' है।
बयान में कहा गया है, "सेमेस्टर के अंत तक ऑनलाइन कक्षाओं को अनिश्चितकाल तक बढ़ाने और विश्वविद्यालय परिसर में भौतिक रूप से प्रवेश पर रोक लगाने का निर्णय, बिना कोई निश्चित समयसीमा बताए या छात्रों से परामर्श किए बिना, हमारी शैक्षणिक प्रगति, शोध कार्य और संस्थागत जुड़ाव को बाधित करता है।"
विश्वविद्यालय परिसर तक भौतिक पहुंच के महत्व का हवाला देते हुए सीडब्ल्यूएएस ने कहा, "'सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज' के विद्वानों और छात्रों के लिए केंद्रीय पुस्तकालय, भौतिक अभिलेखागार, विशेष पत्रिकाओं और प्राथमिक संदर्भ सामग्री तक पहुंच हमारे पाठ्यक्रम और अनुसंधान आवश्यकताओं के लिए मूलभूत है। इन शैक्षणिक संसाधनों को ऑनलाइन प्लेटफार्मों के माध्यम से दोहराया या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।"
इसमें आगे कहा गया, "इसके अलावा कई छात्र दिल्ली में छात्रावास, किराए के आवास, यात्रा और दैनिक जीवन व्यय का वित्तीय बोझ वहन करते रहते हैं, और विश्वविद्यालय से परिसर में शैक्षिक वातावरण प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने की अपेक्षा करते हैं।"
छात्रों ने घोषणा की, “छात्र समुदाय के साथ एकजुटता दिखाते हुए और अपने शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा करते हुए, पश्चिम एशियाई अध्ययन केंद्र के छात्र सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों और परिसर में प्रवेश बहाल होने तक ऑनलाइन कक्षाओं का पूर्ण बहिष्कार करते हैं।”
बयान में कहा गया, “हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि उपस्थिति संबंधी आवश्यकताओं या प्रशासनिक नीति के कारण ऑनलाइन कक्षाओं में किसी भी व्यक्ति की भागीदारी इस आदेश की स्वैच्छिक स्वीकृति या सामूहिक सहमति नहीं मानी जाएगी।”
मांग पत्र जारी करते हुए सीडब्ल्यूएएस के छात्रों ने परिसर की तत्काल बहाली, निश्चित परिचालन कार्यक्रम, रचनात्मक प्रशासनिक सहयोग, संवैधानिक मसौदे की समय सीमा और शैक्षणिक सुरक्षा की मांग की।
इसी प्रकार, जेएमआई (जामिया मिल्लिया इस्लामिया) के समाजशास्त्र विभाग के छात्र विषय संघ ने भी प्रथम सेमेस्टर के अंत तक ऑनलाइन कक्षाओं को बढ़ाने के निर्णय को 'पूरी तरह से अस्वीकार' कर दिया।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया, "बिना किसी निश्चित समयसीमा या छात्रों से सार्थक परामर्श के ऑनलाइन शिक्षा का इस प्रकार मनमाना विस्तार अस्वीकार्य है। यदि छात्र पूरी तरह से ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे तो वे दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों का विकल्प चुन सकते थे।"
समाजशास्त्र विभाग के छात्र विषय संघ ने छात्रों के आवास, भोजन, यात्रा और अन्य जीवन व्यय संबंधी चिंताओं को भी उठाया। इसके अलावा, संघ ने कहा कि विरोध करने वाले छात्र संस्थान के 'शत्रु' नहीं हैं और न ही 'कोई खतरा' हैं।
इसमें कहा गया, “यदि प्रदर्शनकारी उपद्रव बन गए हैं तो प्रशासन को उन्हें संवैधानिक मसौदे की समय सीमा दे देनी चाहिए और इस पूरे मामले को हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहिए। संस्थागत अधिकार का प्रयोग इस तरह से नहीं किया जाना चाहिए, जिससे जवाबदेही की मांग करने वाले व्यापक छात्र समुदाय को प्रभावी रूप से दंडित किया जाए।”
बयान में यह भी दावा किया गया कि विभाग के छात्रों ने अपनी 'स्वेच्छा' और 'सामूहिक सहमति' से ऑनलाइन कक्षाओं का बहिष्कार फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। इसमें आगे कहा गया कि भले ही उपस्थिति संबंधी आवश्यकताओं, शैक्षणिक अनिश्चितता या विश्वविद्यालय की नीतियों के तहत प्रतिकूल परिणामों के भय से उत्पन्न 'दबाव' के कारण दो, पांच या किसी भी संख्या में छात्र वर्चुअल कक्षाओं में भाग लें, “उनकी भागीदारी को प्रशासन के निर्णय की सामूहिक स्वीकृति के रूप में नहीं माना जा सकता।”
--आईएएनएस
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