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हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा को आकार देने वाली प्रमुख समुद्री शक्ति के रूप में उभरा भारत: रिपोर्ट

टोक्यो, 23 मई (आईएएनएस)। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की समुद्री आक्रामकता के खिलाफ भारत की बढ़ती समुद्री रणनीति को सबसे विश्वसनीय और प्रभावी जवाब माना जा रहा है। भारत की ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जापान के साथ लॉजिस्टिक समझौते, तटीय निगरानी नेटवर्क, सेशेल्स में नौसैनिक अड्डों की व्यवस्था और 2024 से फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की बिक्री इस दिशा में अहम कदम माने जा रहे हैं।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा को आकार देने वाली प्रमुख समुद्री शक्ति के रूप में उभरा भारत: रिपोर्ट

टोक्यो, 23 मई (आईएएनएस)। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की समुद्री आक्रामकता के खिलाफ भारत की बढ़ती समुद्री रणनीति को सबसे विश्वसनीय और प्रभावी जवाब माना जा रहा है। भारत की ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जापान के साथ लॉजिस्टिक समझौते, तटीय निगरानी नेटवर्क, सेशेल्स में नौसैनिक अड्डों की व्यवस्था और 2024 से फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की बिक्री इस दिशा में अहम कदम माने जा रहे हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार, क्वाड के अन्य सदस्य देश भारत जैसी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति नहीं रखते, जिससे वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक विशिष्ट भूमिका निभाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति मूल रूप से भारत को केंद्र में रखकर बनाई गई है। इसमें पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्याउकप्यू और बांग्लादेश के चटगांव जैसे बंदरगाह शामिल हैं, जो भारत के समुद्री क्षेत्र को घेरते हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 2008 के बाद से चीन हिंद महासागर क्षेत्र में 45 से अधिक नौसैनिक मिशन भेज चुका है और अब इस क्षेत्र में कम से कम 13 बंदरगाहों का संचालन कर रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यह रणनीति भारत के समुद्री प्रभाव को संतुलित करने और क्षेत्रीय उपस्थिति बढ़ाने के लिए तैयार की गई है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिमी देशों के “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक ढांचे में अक्सर यह नजरअंदाज किया जाता है कि भारत इस क्षेत्र में केवल एक सहयोगी के रूप में नहीं, बल्कि अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण के साथ शामिल हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में मॉरीशस के पोर्ट लुईस में सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) अवधारणा पेश की थी, जो बाद में भारत की समुद्री नीति का आधार बनी।

इस नीति के तहत भारत ने अदन की खाड़ी में एंटी-पाइरेसी अभियान चलाए। कोविड-19 के दौरान मॉरीशस, मालदीव, मेडागास्कर, कोमोरोस और सेशेल्स को सहायता भेजी। श्रीलंका से लेकर बांग्लादेश तक तटीय निगरानी रडार नेटवर्क स्थापित किया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि मार्च 2025 में, भारत ने इस पहल को महासागर (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र उन्नति) में बदल दिया, यह एक ऐसा फ्रेमवर्क है जिसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के समावेशी विकल्प के तौर पर खास तौर पर बनाया गया है।

इसमें यह भी कहा गया है कि इसे जल्दी ही लागू किया गया, अप्रैल 2025 में तंजानिया के साथ एआईकेईवाईएमई (अफ्रीका-इंडिया की मैरीटाइम एंगेजमेंट) नेवल एक्सरसाइज में दस अफ्रीकी देश एक साथ आए, जबकि भारत के आईओएस सागर मिशन ने अफ्रीकी और दक्षिण एशियाई नेवी के लोगों के साथ मिलकर ईईजेड में गश्त की।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका के साथ औपचारिक सुरक्षा अलायंस में शामिल होने से भारत का इनकार ही एफओआईपी को ग्लोबल साउथ में पश्चिमी देशों को रोकने वाले प्रोजेक्ट के तौर पर नहीं देखा जाने देता।

इसमें कहा गया है, “विश्लेषकों का कहना है कि एफओआईपी को अक्सर चीन का मुकाबला करने के एक फ्रेमवर्क के तौर पर भी देखा जाता है और पूरे इलाके में ऑर्गनाइजिंग प्रिंसिपल के तौर पर इसकी विश्वसनीयता के लिए इनक्लूसिविटी पर जोर देना जरूरी है। भारत का अपनी शर्तों पर हिस्सा लेना, आसियान, अफ्रीका और साउथ एशिया के अलग-थलग देशों को यह संकेत देता है कि एफओआईपी कोई दूसरे शीत युद्ध का विकल्प नहीं है।”

--आईएएनएस

केके/वीसी

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