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महिला अधिकारों के लिए हंसा मेहता की लड़ाई एआई युग में सुरक्षा के लिए संघर्ष को प्रेरित करती है: यूएनजीए अध्यक्ष

संयुक्त राष्ट्र, 8 मार्च (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष एनालेना बेयरबॉक के अनुसार महिलाओं की पहचान और अधिकारों के लिए भारत की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नेता हंसा मेहता का दृढ़ रुख आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चल रहे मौजूदा संघर्षों को यह प्रेरणा देता है।
महिला अधिकारों के लिए हंसा मेहता की लड़ाई एआई युग में सुरक्षा के लिए संघर्ष को प्रेरित करती है: यूएनजीए अध्यक्ष

संयुक्त राष्ट्र, 8 मार्च (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष एनालेना बेयरबॉक के अनुसार महिलाओं की पहचान और अधिकारों के लिए भारत की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नेता हंसा मेहता का दृढ़ रुख आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चल रहे मौजूदा संघर्षों को यह प्रेरणा देता है।

बेयरबॉक ने कहा है, “जब हम इन नए एआई रेगुलेशन पर काम कर रहे हों, तो हमें हर दिन याद दिलाया जाना चाहिए कि हम अपना पक्ष मजबूती से रखें, जैसा हंसा मेहता ने एक बार किया था।”

उल्लेखनीय है कि हंसा मेहता को 'मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा' (यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स) के पहले आर्टिकल की भाषा बदलने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने पुरुषों पर केंद्रित मूल शब्दावली को बदलकर 'सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान उत्पन्न हुए हैं' करवाया। उनके इस ऐतिहासिक हस्तक्षेप के कारण ही मानवाधिकारों के वैश्विक दायरे में महिलाओं को समान स्थान प्राप्त हो सका।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन द्वारा आयोजित वार्षिक 'हंसा मेहता मेमोरियल लेक्चर' में बेयरबॉक ने कहा, “उनकी विरासत उन बुनियादी सिद्धांतों में जीवंत है, जिन्हें उन्होंने सार्वभौमिक घोषणा में समाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।”

वर्ष 1948-49 में जब मानवाधिकार आयोग की सदस्य के रूप में हंसा मेहता ने 'सभी पुरुषों' के स्थान पर 'सभी मनुष्यों' शब्द का प्रस्ताव रखा, तो शुरुआत में इसे सिरे से खारिज कर दिया गया था।

बेयरबॉक ने उनके दृढ़ संकल्प की सराहना करते हुए कहा, “वे तब तक अपनी मांग पर अडिग रहीं, जब तक उन्हें एक स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं मिल गई। दस्तावेज़ के पन्नों पर वह एक मामूली सा सुधार प्रतीत होता था, लेकिन उसके परिणाम अत्यंत व्यापक सिद्ध हुए।”

इस साल इस प्रस्तुती का थीम “सोशल ट्रांसफॉर्मेशन के लिए रुकावटें तोड़ना: डॉ. हंसा मेहता की इंस्पायरिंग जिंदगी” था। बैरबॉक ने कहा, “डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में तरक्की से बदलाव का वादा किया गया है, फिर भी महिलाओं को डिजिटल टूल्स तक बराबर पहुंच मिलने की संभावना कम है।”

इसके अलावा, उन्होंने इस बात को भी हाईलाइट किया कि इन तकनीक का इस्तेमाल महिलाओं को टारगेट करने के लिए किया जा रहा है। बैरबॉक ने कहा, “96 फीसदी बिना सहमति के डीपफेक पोर्नोग्राफी में महिलाओं को दिखाया जाता है।”

बैरबॉक ने कहा, “जब हम इन नए एआई रेगुलेशन पर काम कर रहे हों तो हमें हर दिन याद दिलाया जाना चाहिए कि हम अपना स्टैंड मजबूती से रखें, जैसा हंसा मेहता ने एक बार किया था।”

इसलिए, उन्होंने आगे कहा, यह सही था कि “भारत दूसरे एआई इम्पैक्ट समिट की मेजबानी कर रहा है, जो इन तकनीक का इस्तेमाल इनक्लूसिव और इक्विटेबल डेवलपमेंट के लिए करने की प्रतिबद्धता को दिखाता है।"

उन्होंने कहा, “अगर सिर्फ एक इंसान इतना बड़ा बदलाव ला सकता है, तो सोचिए कि जब यह मौका पूरी इंसानियत को दिया जाए तो समाज कितना बड़ा बदलाव ला सकता है।”

बता दें, हंसा मेहता भारत की संविधान सभा में केवल 15 महिलाओं में से एक थीं, जो संविधान का ड्राफ्ट बनाने के लिए जिम्मेदार थीं।

--आईएएनएस

केके/एएस

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