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‘हैवान’ रिव्यू: अक्षय कुमार की खौफनाक मौजूदगी और सैफ अली खान का संयम बनाता है फिल्म को दमदार

‘हैवान’ रिव्यू: अक्षय कुमार की खौफनाक मौजूदगी और सैफ अली खान का संयम बनाता है फिल्म को दमदार
‘हैवान’ रिव्यू: अक्षय कुमार की खौफनाक मौजूदगी और सैफ अली खान का संयम बनाता है फिल्म को दमदार

निर्देशक: प्रियदर्शन, कलाकार: सैफ अली खान, अक्षय कुमार, बोमन ईरानी, श्रिया पिलगांवकर, सैयामी खेर, मोहनलाल, असरानी, शारिब हाशमी, पहल चौधरी, अवधि: 2 घंटे 44 मिनट, रेटिंग: 4/5

फिल्म 'हैवान' की सबसे बड़ी ताकत इसके दो ऐसे कलाकार हैं, जो कहानी में एक-दूसरे के बिल्कुल उलट खड़े नजर आते हैं। एक तरफ अक्षय कुमार का खतरनाक और डर पैदा करने वाला किरदार है, तो दूसरी तरफ सैफ अली खान का शांत और समझदार अंदाज। निर्देशक प्रियदर्शन की यह साइकोलॉजिकल एक्शन क्राइम थ्रिलर 18 साल बाद अक्षय कुमार और सैफ अली खान को एक साथ लेकर आती है। कहानी मूल रूप से एक खतरनाक अपराधी और दृष्टिबाधित व्यक्ति के बीच चलने वाली ऐसी जंग है, जिसमें ताकत के साथ-साथ दिमाग, सूझबूझ और हिम्मत भी मायने रखती है।

फिल्म का पहला बड़ा टॉकिंग पॉइंट अक्षय कुमार हैं, जिन्होंने अब तक की अपनी सबसे डार्क और सबसे खतरनाक परफॉर्मेंस में से एक दी है। वह विलेन के किरदार को ऊंची आवाज और जरूरत से ज्यादा गुस्से के साथ पेश नहीं करते। इसके बजाय उनके किरदार में एक अजीब सी शांति है, जो उसे और ज्यादा डरावना बनाती है। उनके चेहरे के एक्सप्रेशन, बॉडी लैंग्वेज और डायलॉग बोलने का अंदाज देखकर परशुराम की अगली चाल का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। उनके अभिनय में मौजूद यह शांत खौफ फिल्म में एक टेंशन का एलिमेंट लगातार बनाए रखता है।

वहीं सैफ अली खान श्याम के किरदार में बेहद प्रभावी दिख रहे हैं। दृष्टिबाधित श्याम अचानक एक बेहद खतरनाक स्थिति में फंस जाता है और उससे निकलने के लिए उसे अपनी समझ, सुनने की क्षमता, आसपास की चीजों को महसूस करने की ताकत और हिम्मत पर भरोसा करना पड़ता है। सैफ इस किरदार की कमजोरी को जरूरत से ज्यादा दिखाने की कोशिश नहीं करते। वह श्याम की समझदारी और जुझारूपन को भी सामने रखते हैं। खासकर अक्षय के साथ आमने-सामने वाले सीन में सैफ का संयम और अभिनय बेहद असरदार लगता है।

यही अक्षय और सैफ की भिड़ंत 'हैवान' का सबसे बड़ा आकर्षण है। दोनों के बीच होने वाला टकराव सिर्फ फिजिकल नहीं है, बल्कि दिमागी खेल भी है। परशुराम के पास ताकत, आत्मविश्वास और परिस्थितियों को अपने हिसाब से मोड़ने की क्षमता है, जबकि श्याम को हर कदम पर अपनी समझ और सहज बुद्धि का सहारा लेना पड़ता है। यही अंतर दोनों के सीन में रोमांच पैदा करता है। दर्शक लगातार यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि अगली चाल किसकी होगी।

फिल्म में पहल चौधरी एक बड़ा सरप्राइज बनकर सामने आती हैं। युवा कलाकार ने अपने किरदार को काफी आत्मविश्वास के साथ निभाया है। उनके अभिनय में मासूमियत और सच्चाई है। उनकी मौजूदगी कहानी में भावनात्मक जुड़ाव पैदा करती है और दर्शक को किरदारों के साथ जोड़ने में मदद करती है। बड़े कलाकारों के बीच भी वह अपनी अलग जगह बनाने में सफल रहती हैं।

सहायक कलाकारों ने भी फिल्म को मजबूती दी है। सैयामी खेर, श्रिया पिलगांवकर और बोमन ईरानी अपने-अपने किरदारों में सहज और प्रभावी नजर आते हैं। शारिब हाशमी पुलिस अधिकारी की भूमिका में कहानी के जांच वाले हिस्से को स्वाभाविक बनाए रखते हैं। वहीं दिवंगत अभिनेता असरानी का अभिनय भी दिल छूता है और याद रह जाता है। स्क्रीन पर उनका आखिरी बार दिखना उनकी मौजूदगी को और भी इमोशनल अहमियत देता है।

प्रियदर्शन एक बार फिर साबित करते हैं कि उन्हें कमर्शियल सिनेमा की नब्ज अच्छी तरह समझ आती है। 'हैवान' उनके करियर की 98वीं फिल्म है और इसमें वह भावनाओं, रोमांच, तनाव और मनोरंजन के बीच अच्छा संतुलन बनाए रखते हैं। फिल्म की लंबाई 2 घंटे 44 मिनट है, लेकिन ऐसा कम ही लगता है कि कहानी को बेवजह खींचा जा रहा है। परफॉर्मेंस, टकराव और थ्रिलर का लगातार आगे बढ़ना कहानी को आगे बढ़ाता है।

फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी इसके माहौल को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाता है। खासकर टकराव वाले सीन में संगीत तनाव को और बढ़ाता है और दर्शक को अगले पल के लिए तैयार करता है। यह संगीत कलाकारों के अभिनय पर हावी नहीं होता, बल्कि सीन के प्रभाव को बढ़ाता है।

प्रीतम का संगीत भी कहानी के साथ जुड़ा हुआ महसूस होता है। 'मेरे हीरो है वो' भावनात्मक असर पैदा करता है, जबकि 'रंगियारा' यात्रा वाले हिस्सों में अच्छी तरह बैठता है। गाने फिल्म के माहौल को थोड़ा हल्का करने के साथ-साथ जुड़े रहते हैं।

'हैवान' प्रियदर्शन की मलयालम थ्रिलर 'ओप्पम' का हिंदी रूपांतरण है। मूल फिल्म से परिचित दर्शक इसकी कहानी से अनजान नहीं होंगे, लेकिन हिंदी रूपांतरण को अलग अंदाज, प्रस्तुति और व्यावसायिक रंग देने की कोशिश की गई है। कलाकारों का अभिनय कहानी में नई ऊर्जा भरता है। वहीं मोहनलाल की स्पेशल अपीयरेंस, जिसमें वह मूल फिल्म की अपनी मौजूदगी को दोहराते हैं, 'ओप्पम' देखने वाले दर्शकों के लिए खास आकर्षण है और दोनों फिल्मों के बीच एक खूबसूरत कड़ी बनाती है।

'हैवान' की सबसे बड़ी खूबी इसके कलाकारों का अभिनय है। अक्षय कुमार बिना ज्यादा शोर किए अपने किरदार में खौफ पैदा करते हैं, जबकि सैफ अली खान अपने संयम और बारीक अभिनय से तनाव पैदा करते हैं। दोनों का यह अलग अंदाज उनकी भिड़ंत को एक सामान्य नायक-विलेन की लड़ाई नहीं बनने देता। दर्शक लगातार दोनों की अगली चाल का इंतजार करता रहता है और यहीं फिल्म अपनी सबसे मजबूत पकड़ बनाती है।

कुल मिलाकर 'हैवान' अपने जरूरी हिस्सों को सही तरीके से जोड़ने में सफल रहती है। अक्षय कुमार का किरदार परशुराम खौफ पैदा करता है, सैफ अली खान का श्याम कहानी को इंसानी भावनाओं से जोड़ता है और पहल चौधरी एक शानदार अंदाज में सामने आती हैं। सहायक कलाकार कहानी को मजबूती देते हैं, जबकि प्रियदर्शन रोमांच और भावनाओं का संतुलन बनाए रखते हैं।

'हैवान' एक ऐसी थ्रिलर है, जिसमें उसके सबसे जरूरी हिस्से सही जगह पर काम करते हैं। अक्षय कुमार को अपने करियर का एक बेहद दमदार नकारात्मक किरदार मिला है, सैफ अली खान ने चुनौतीपूर्ण भूमिका को गहराई और संयम के साथ निभाया है और पहल चौधरी ने अपनी मौजूदगी से चौंकाया है। लेकिन फिल्म की असली जान अक्षय और सैफ की भिड़ंत है।

प्रियदर्शन का निर्देशन इस टकराव के तनाव को बनाए रखता है और रोमांच, भावना, ड्रामा और बड़े पर्दे के मनोरंजन को एक साथ लेकर चलता है। कहानी भले ही पहले से जानी-पहचानी जमीन पर खड़ी हो, लेकिन कलाकारों का अभिनय, फिल्म का माहौल और इसका प्रस्तुतीकरण इसे एक अच्छा सिनेमाई अनुभव बना देता है।

--आईएएनएस

पीके/एएस

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