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गुजरात विधानसभा ने स्कूलों के नियमों को सख्त करने और विशेष शिक्षकों की व्यवस्था लागू करने वाला बिल किया पास

गुजरात विधानसभा ने स्कूलों के नियमों को सख्त करने और विशेष शिक्षकों की व्यवस्था लागू करने वाला बिल किया पास
गुजरात विधानसभा ने स्कूलों के नियमों को सख्त करने और विशेष शिक्षकों की व्यवस्था लागू करने वाला बिल किया पास

गांधीनगर, 10 सितंबर (आईएएनएस)। गुजरात विधानसभा ने गुरुवार को 'गुजरात माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा अधिनियम, 1972' में संशोधन पारित किए। इन संशोधनों के तहत बिना मंजूरी के स्कूल चलाने, गैर-कानूनी नियुक्तियां करने और रजिस्टर्ड स्कूलों को मनमाने ढंग से बंद करने पर सजा बढ़ाई गई है। साथ ही, इनमें स्पेशल एजुकेटर्स (विशेष शिक्षकों) के लिए प्रावधान और सहायता प्राप्त व निजी संस्थानों के लिए स्पष्ट कानूनी वर्गीकरण भी शामिल किए गए हैं।

संशोधित नियमों के तहत सरकारी मदद पाने वाले सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों में प्रिंसिपल या टीचर की गैर-कानूनी तरीके से नियुक्ति करने पर स्कूल मैनेजमेंट को 10 लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। पहले यह जुर्माना सिर्फ 1,000 रुपये था।

सरकार ने कहा, "इस नियम का मकसद भर्ती प्रक्रिया में ज्यादा पारदर्शिता लाना है।"

इस संशोधन से बिना रजिस्ट्रेशन वाले स्कूलों के लिए भी कानून सख्त हो गया है। कोई भी स्कूल गुजरात सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी एजुकेशन बोर्ड में रजिस्ट्रेशन कराए बिना शिक्षा नहीं दे सकता।

पहले एक लाख से दो लाख रुपए तक के जुर्माने की जगह अब कम से कम एक साल और ज्यादा से ज्यादा दो साल की जेल, या 10 लाख से 15 लाख रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

बोर्ड को बताए बिना किसी रजिस्टर्ड सेकेंडरी या हायर सेकेंडरी स्कूल को मनमाने ढंग से बंद करने पर लगने वाले जुर्माने को भी काफी बढ़ा दिया गया है।

पहले, एकेडमिक सेशन के दौरान जरूरी छह महीने का नोटिस दिए बिना स्कूल बंद करने पर 1,000 रुपए का जुर्माना लगता था, लेकिन संशोधित नियम के तहत अब 20 लाख रुपए का जुर्माना लगेगा।

सरकार ने कहा कि इस कदम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि स्कूल मैनेजमेंट के फैसलों से छात्रों की पढ़ाई पर बुरा असर न पड़े। छह महीने के नोटिस की शर्त अभी भी नियमों का हिस्सा है।

संशोधनों में स्पेशल एजुकेटर्स की नियुक्ति के लिए भी कानूनी ढांचा तैयार किया गया है। इस नियम का मकसद खास जरूरतों वाले बच्चों (सीडूब्ल्यूएसएन) के लिए समावेशी शिक्षा को मजबूत करना है, ताकि दिव्यांग छात्रों को खास तौर पर प्रशिक्षित टीचरों से सही शैक्षिक अवसर और मार्गदर्शन मिल सके।

यह कानून सरकारी मदद पाने वाले (ग्रांटेड) स्कूलों और पूरी तरह से प्राइवेट (बिना ग्रांट वाले) स्कूलों के बीच अंतर करता है।

सरकारी मदद पाने वाले रजिस्टर्ड सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों के लिए, प्रिंसिपल, टीचर, स्पेशल एजुकेटर और नॉन-टीचिंग स्टाफ की योग्यता, काम करने के तरीके और चयन प्रक्रिया राज्य सरकार नियमों के ज़रिए तय करेगी।

रजिस्टर्ड प्राइवेट स्कूलों के लिए, सरकार इन कैटेगरी के स्टाफ की योग्यता तय करेगी। स्टाफ की भर्ती पर राज्य की मौजूदा आरक्षण नीति भी लागू होगी।

संशोधनों में एक्ट की धारा 3(2) के तहत क्लास-बी के चुने हुए सदस्यों के गठन में भी बदलाव किया गया है।

तीसरी कैटेगरी के लिए अब रजिस्टर्ड सेकेंडरी स्कूलों (पोस्ट-बेसिक और सरकारी स्कूलों को छोड़कर) के टीचरों में से एक सदस्य चुना जाएगा। सरकारी स्कूलों, हायर बेसिक स्कूलों और हायर सेकेंडरी स्कूलों के प्रतिनिधियों के लिए अलग से नियम पहले से ही मौजूद हैं। पांचवीं कैटेगरी में बदलाव किया गया है ताकि इसमें सरकारी सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों और पूरी तरह से प्राइवेट सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों के नॉन-टीचिंग स्टाफ को साफ तौर पर शामिल किया जा सके। नौवीं कैटेगरी, जो पेरेंट एसोसिएशन के प्रतिनिधित्व से जुड़ी है, उसका दायरा भी बढ़ाया गया है।

इस प्रावधान से 'प्राइवेट' शब्द हटा दिया गया है, जिससे सभी रजिस्टर्ड सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों के पेरेंट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा ले सकेंगे।

इस प्रावधान की व्याख्या में भी संशोधन किया गया है ताकि दोनों तरह के स्कूलों के पेरेंट एसोसिएशन को इसमें स्पष्ट रूप से शामिल किया जा सके।

डीकेपी/

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