जनरल वीके सिंह और दिल्ली के विधायक 30 अप्रैल को प्रथम विश्व युद्ध के भारतीय शहीदों को देंगे श्रद्धांजलि
नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। मिजोरम के राज्यपाल जनरल वी.के. सिंह 30 अप्रैल को दिल्ली विधानसभा में औपनिवेशिक काल के ‘वॉर कॉन्फ्रेंस’ की 108वीं वर्षगांठ पर आयोजित एक सेमिनार की अध्यक्षता करेंगे। एक अधिकारी ने मंगलवार को यह जानकारी दी। इस दौरान वे दिल्ली के विधायकों के साथ मिलकर उन भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देंगे, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी थी।
एक अधिकारी ने कहा, “28 अप्रैल 1918 को दिल्ली विधानसभा भवन में आयोजित सम्मेलन के 108 वर्ष पूरे होने के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस दौरान राज्यपाल मुख्य भाषण भी देंगे और औपनिवेशिक काल की उस बैठक की कार्यवाही को दोबारा प्रस्तुत करने वाला एक प्रकाशन भी जारी करेंगे।”
मंगलवार को दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने राज्य के विधायकों के साथ मिलकर उन सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने विदेशी धरती पर अपने प्राणों की आहुति दी।
उन्होंने कहा, “कृपया उन भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक मिनट का मौन रखें, जिन्होंने 108 वर्ष पहले अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। ”
स्पीकर गुप्ता ने एक बयान में कहा कि इसी सदन में, जहाँ आज हम दिल्ली की जनता के प्रतिनिधियों के रूप में बैठे हैं, तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने 27, 28 और 29 अप्रैल 1918 को एक ऐतिहासिक ‘युद्ध सम्मेलन’ बुलाया था।
विधायकों को अतीत की याद दिलाते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि पूरे देश से लगभग 120 प्रतिनिधि यहाँ एकत्र हुए थे, जिनमें रियासतों के शासक, प्रांतों के प्रतिनिधि और राष्ट्रीय नेता शामिल थे। उन्होंने आगे कहा, “विषय था-प्रथम विश्व युद्ध में भारत की भूमिका।”
स्पीकर ने कहा, “इस सम्मेलन का महत्व न केवल भारतीय सैनिकों की भर्ती के लिए यहां की गई अपील में था, बल्कि इस बात में भी था कि महात्मा गांधी स्वयं यहां उपस्थित थे और उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ भारत के पूर्ण सहयोग का समर्थन किया था। उनका मानना था कि युद्ध में भारत की निष्ठा का प्रतिफल ‘स्वराज’ या ‘स्व-शासन’ के रूप में मिलेगा।”
उन्होंने कहा, “इतिहास गवाह है कि इस भरोसे को तोड़ा गया। उन्होंने आगे कहा, ‘पहले विश्व युद्ध के दौरान फ़्लैंडर्स से लेकर गैलीपोली और मेसोपोटामिया तक, ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से लगभग 13 लाख भारतीय सैनिकों ने सेवा दी थी।"
उन्होंने कहा, “74,000 से भी ज़्यादा भारतीय सैनिकों ने विदेशी धरती पर अपनी जान न्योछावर कर दी। कृतज्ञता के बदले, भारत को इसी सदन से ‘रॉलेट एक्ट’ और ‘जलियाँवाला बाग नरसंहार’ मिला।”
उन्होंने कहा, "यह सदन जिसमें हम आज बैठे हैं, यह ऐतिहासिक ‘पुराना सचिवालय’, जिसका निर्माण 1912 में हुआ था और जिसे ई. मोंटेग्यू थॉमस ने डिजाइन किया था—केवल ईंट और पत्थर से बनी एक इमारत नहीं है, बल्कि यह भारत के संसदीय इतिहास का जन्मस्थल है।”
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने कहा, "“इसी कक्ष में 17 जनवरी 1913 को केंद्रीय विधान परिषद की पहली बैठक आयोजित की गई थी। गोपाल कृष्ण गोखले, बिपिन चंद्र पाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और विट्ठलभाई पटेल जैसे प्रख्यात नेताओं ने इन्हीं दीवारों के बीच अपनी आवाज़ उठाई थी।,”
उन्होंने आगे कहा, "यह हमारा कर्तव्य है कि हम उन 75,000 गुमनाम भारतीय सैनिकों को याद करें, जिन्होंने एक ऐसे युद्ध में अपनी जान न्योछावर कर दी जो उनका अपना नहीं था और जिन्हें लंबे समय तक इतिहास ने भुला दिया था। एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर हम उनके बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।”
उन्होंने कहा, “इसके साथ ही, इस संस्था की विरासत की गहराई को पहचानना भी हमारा कर्तव्य है। जिन दीवारों में कभी किसी शाही वायसराय की आवाज़ गूंजती थी, आज उन्हीं दीवारों में एक स्वतंत्र भारत के चुने हुए प्रतिनिधियों की आवाज़ें गूंज रही हैं। यह बदलाव, यह सफर—यही हमारे स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धि है।”
--आईएएनएस
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