श्रमिक दिवस से पहले गहलोत ने सीएम भजन लाल को लिखा पत्र, राजस्थान में न्यूनतम मजदूरी को बताया बहुत कम
जयपुर, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस से पहले राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को पत्र लिखकर राजस्थान में न्यूनतम वेतन के कम स्तर पर गंभीर चिंता जताई है और तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने का आग्रह किया है।
पत्र में गहलोत ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य के श्रम विभाग के मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, न्यूनतम मजदूरी के मामले में राजस्थान देश के सबसे निचले पायदान वाले राज्यों में से एक है। उन्होंने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि इस पर तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने बताया कि राजस्थान में अभी अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 7,410 रुपए प्रति माह और अत्यधिक कुशल श्रमिकों के लिए 9,334 रुपए प्रति माह है। पिछले एक दशक में वेतन में केवल 40–50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) लगभग दोगुना हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों की वास्तविक आय में केवल मामूली वृद्धि हुई है।
तुलना करते हुए गहलोत ने बताया कि केरल जैसे राज्यों में मजदूरी में 90-110 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि तमिलनाडु और दिल्ली में 80-90 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस मामले में राजस्थान मजदूरी में बढ़ोतरी और संशोधन के मामले में काफी पीछे रह गया है।
मजदूरी प्रणाली में मौजूद ढांचागत समस्याओं की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि 'वेरिएबल डियरनेस अलाउंस' (वीडीए) में संशोधन अनियमित हैं और उनके लिए कोई समय-सीमा तय नहीं है, जिसके कारण मजदूरों को महंगाई के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
इसके अलावा, उन्होंने यह भी बताया कि कृषि, निर्माण, घरेलू काम और ईंट भट्ठों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम करने की स्थितियों में भारी अंतर होने के बावजूद, राज्य सरकार 'अनलिस्टेड' (सूचीबद्ध न किए गए) रोजगारों के लिए एक समान वेतन दर का पालन करती है।
गहलोत ने आगे कहा कि परिवहन, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे प्रमुख लागत घटकों को वेतन की गणना में शामिल नहीं किया जाता है, जबकि इन जरूरी क्षेत्रों में खर्च लगातार बढ़ रहा है।
इन चिंताओं को दूर करने के लिए उन्होंने कई सुधारों का सुझाव दिया, जिनमें न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाकर 12 हजार रुपए से 15 हजार रुपए प्रति माह करना, हर छह महीने में वीडीए में अनिवार्य संशोधन करना, अलग-अलग सेक्टर के लिए अलग-अलग मजदूरी दरें लागू करना, मजदूरी की गणना में जीवन-यापन के जरूरी खर्चों को शामिल करना, बेहतर निगरानी और कड़े दंड के जरिए न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के पालन को मजबूत बनाना शामिल है।
उचित मजदूरी के महत्व पर जोर देते हुए गहलोत ने कहा कि असंगठित क्षेत्र के मजदूर राजस्थान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और अपर्याप्त पारिश्रमिक से उनकी आजीविका और राज्य की आर्थिक वृद्धि, दोनों पर बुरा असर पड़ सकता है।
केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि राजस्थान में एक क्षेत्र-विशेष मजदूरी अधिसूचना प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, ताकि कृषि, निर्माण, हस्तशिल्प और घरेलू सेवाओं जैसे क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मजदूरी दरें तय की जा सकें।
उन्होंने आगे कहा कि परिवहन, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के भत्तों को वेतन की गणना में शामिल किया जाना चाहिए, जैसा कि कई अन्य राज्यों में प्रचलित प्रथा है।
गहलोत ने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यूनतम वेतन अधिनियम के प्रवर्तन को मजबूत किया जाना चाहिए, इसके लिए श्रम निरीक्षकों की नियुक्ति, डिजिटल निगरानी प्रणालियों के कार्यान्वयन और उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड जैसे उपाय अपनाए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि राजस्थान एक ऐसा राज्य है जहां बड़ी संख्या में कार्यबल मौजूद है। यहां असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर और श्रमिक राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता है, तो न केवल उनके परिवारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, बल्कि राज्य की उपभोग क्षमता और आर्थिक विकास पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। मैं आपसे पूरी गंभीरता के साथ आग्रह करता हूं कि आप इस मामले पर गहन विचार करें और इसमें सकारात्मक बदलाव लाएं।
उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे इस मामले को गंभीरता से लें और राज्य में श्रमिकों की स्थिति सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाएं।
--आईएएनएस
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