मानसून सत्र: लोकसभा में बदले समीकरण, टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी को पूर्व सहयोगियों के पीछे मिली सीट
नई दिल्ली, 20 जुलाई (आईएएनएस)। साल 2009 से 2014 के बीच जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की लोकसभा में ताकत बढ़ी, तब ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी ने संसद में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की। इसी दौरान पार्टी ने संसद में अपने लिए अलग कार्यालय की भी मांग की थी।
2009 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के 19 सांसद चुने गए थे, जबकि 2014 में यह संख्या बढ़कर 34 हो गई थी। उस समय पार्टी ने संसद में बढ़ती ताकत के आधार पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की थी। वहीं, उसी दौर में वाम दलों, खासकर माकपा (सीपीआई-एम) की लोकसभा में ताकत लगातार घट रही थी।
उस समय सीपीआई (एम) का संसदीय कार्यालय संसद की पुरानी इमारत (अब संविधान सदन) की सबसे ऊपरी मंजिल पर था। बाद में तृणमूल कांग्रेस को भी संसद में अपना कार्यालय मिल गया।
हालांकि सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी को सदन के नियमों के अनुसार अपने पूर्व सहयोगी सुदीप बंद्योपाध्याय के पीछे सीट आवंटित की गई।
सुदीप बंद्योपाध्याय अब नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के नेता हैं। इस पार्टी के लोकसभा में 20 सांसद हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस के पास अब केवल 8 सांसद बचे हैं।
तृणमूल कांग्रेस में बड़े विभाजन के बाद 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर एनसीपीआई में विलय कर लिया था। लोकसभा अध्यक्ष ने संविधान की दसवीं अनुसूची और संसदीय परंपराओं के आधार पर इस नए समूह को अलग संसदीय दल के रूप में मान्यता देते हुए अलग बैठने की अनुमति दी।
इस बदलाव से लोकसभा में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की स्थिति और मजबूत हो गई है।
तृणमूल कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 29 सीटें जीती थीं, लेकिन इस साल विधानसभा चुनाव में झटके मिलने के बाद पार्टी में अंदरूनी मतभेद बढ़ गए। इसी दौरान एक सांसद के निधन के कारण एक सीट भी खाली हो गई।
सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तिदार समेत 20 सांसदों ने अलग संसदीय समूह बना लिया। इन नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के नाम पर दावा करने के बजाय चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करना बेहतर समझा। हालांकि इस पार्टी ने पहले कभी कोई लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था।
इस विलय के बाद एनसीपीआई अचानक लोकसभा के प्रमुख संसदीय समूहों में शामिल हो गई और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की महत्वपूर्ण सहयोगी बन गई।
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत बने दलबदल विरोधी कानून के अनुसार, यदि कोई सांसद स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है, लेकिन यदि किसी संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय के लिए सहमत हों, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाता।
तृणमूल कांग्रेस के कुल सांसदों में से दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का फैसला किया था। इसलिए उन्हें दलबदल कानून के तहत तत्काल अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
हालांकि, अभिषेक बनर्जी समेत तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने इन सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष के पास याचिका दायर की है। लेकिन संसदीय दलों को मान्यता देना और सदन में बैठने की व्यवस्था तय करना लोकसभा अध्यक्ष का अधिकार है।
विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक और नैतिक वैधता पर सवाल उठा रहा है, लेकिन संसदीय प्रक्रिया और संविधान के प्रावधानों के अनुसार अब तक उठाए गए कदम नियमों के अनुरूप माने जा रहे हैं।
लोकसभा में नए संख्या बल के बाद एनडीए की स्थिति और मजबूत हुई है, जबकि तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव पहले की तुलना में काफी कम हो गया है।
--आईएएनएस
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