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बंगाल: बेलूर मठ में महाषष्ठी के साथ दुर्गा पूजा की शुरुआत, 125 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन

बंगाल: बेलूर मठ में महाषष्ठी के साथ दुर्गा पूजा की शुरुआत, 125 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन
बंगाल: बेलूर मठ में महाषष्ठी के साथ दुर्गा पूजा की शुरुआत, 125 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन

कोलकाता, 16 अक्टूबर (आईएएनएस)। महाषष्ठी के अवसर पर शुक्रवार सुबह पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले स्थित बेलूर मठ में दुर्गा पूजा 2026 के अनुष्ठानों की शुरुआत हुई। यह पूजा स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित परंपराओं के अनुसार रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय में संपन्न की जा रही है।

दुर्गा पूजा के अनुष्ठानों की शुरुआत पारंपरिक भक्ति, शास्त्रीय विधानों और उन ऐतिहासिक परंपराओं के समन्वय के साथ हुई, जिन्हें स्वामी विवेकानंद ने बेलूर मठ में स्थापित किया था। अपने लेखों में स्वामी विवेकानंद ने इस संस्थान को ऐसा केंद्र बताया था, जिसकी निष्कलंक किरणें पूरे विश्व को आलोकित कर सकती हैं और मानव जीवन में परिवर्तन ला सकती हैं।

शुक्रवार तड़के बेलूर मठ के संन्यासियों की सहभागिता के साथ पूजा-विधि का शुभारंभ हुआ। सबसे पहला अनुष्ठान ‘कल्पारंभ’ संपन्न किया गया, जो दुर्गा पूजा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस अनुष्ठान में ‘कलश’ की स्थापना की जाती है, जो मां दुर्गा की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है। मुख्य पूजा से पहले देवी का आह्वान करने और उनकी उपस्थिति का स्वागत करने के उद्देश्य से यह विधि की जाती है।

बेलूर मठ में वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुरूप शुक्रवार शाम ‘बोधन’ सहित अन्य प्रमुख अनुष्ठान संपन्न किए जाएंगे। ‘बोधन’ को देवी दुर्गा के जागरण और विधिवत आह्वान की रस्म माना जाता है, जिसका दुर्गा पूजा में विशेष महत्व है।

श्री रामकृष्ण परमहंस, उनकी पत्नी और आध्यात्मिक संगिनी शारदा देवी तथा स्वामी विवेकानंद की प्रतिमाओं पर फूल भी अर्पित किए गए। इन उत्सवों की शुरुआत देखने के लिए गंगा के तट पर स्थित बेलूर मठ में हजारों भक्त और अनुयायी एकत्र हुए।

बेलूर मठ के एक अधिकारी ने कहा, "बेलूर मठ में दुर्गा पूजा, जिसकी शुरुआत स्वामीजी ने श्री ठाकुर रामकृष्ण की विचारधारा को ध्यान में रखते हुए की थी, आज भी उसी पवित्रता के साथ मनाई जाती है। इसमें देवी दुर्गा को अपने हृदय में स्थापित करने का संदेश दिया गया है। हम देवी दुर्गा से प्रार्थना करते हैं कि वे संसार का कल्याण करें और सभी के हृदय में मौजूद आसुरी प्रवृत्तियों का विनाश करें।"

स्वामी विवेकानंद ने 1901 में बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। इस तरह 2026 में होने वाले आयोजन इस परंपरा की शुरुआत की 125वीं वर्षगांठ होंगे।

यह पूजा इसलिए खास है, क्योंकि इसमें पशु बलि नहीं दी जाती है। चूंकि शारदा देवी पशु बलि की प्रथा के खिलाफ थीं, इसलिए स्वामी जी ने इस त्योहार के दौरान प्रतीकात्मक बलि के रूप में फल और सब्जियां चढ़ाने की परंपरा शुरू की।

बेलूर मठ के एक अधिकारी ने बताया, "स्वामी जी द्वारा शुरू की गई इस पूजा में जाति, धर्म या पंथ से ऊपर उठकर सभी वर्गों के लोग एक साथ बैठते हैं और उन्हें 'प्रसाद' के रूप में 'खिचड़ी' परोसी जाती है। यह सामाजिक पुनर्जागरण का एक सार्थक प्रतीक है।"

जो भक्त व्यक्तिगत रूप से इन आयोजनों में शामिल नहीं हो सकते, उनके लिए दूरदर्शन और बेलूर मठ के आधिकारिक चैनल पर लाइव प्रसारण की व्यवस्था की गई है। महाषष्ठी के अवसर पर यह संस्थान एक बार फिर भक्ति, इतिहास और उत्सव के मिलन स्थल के रूप में उभर आया है।

--आईएएनएस

एएसएच/वीसी

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