'कश्मीरियत' सहअस्तित्व की आत्मा है और मानवता को धार्मिक विचारों से ऊपर उठना चाहिए: कर्ण सिंह
श्रीनगर, 27 जून (आईएएनएस)। जम्मू और कश्मीर के पूर्व 'सदर-ए-रियासत' (राज्य प्रमुख) कर्ण सिंह ने शनिवार को कहा कि कश्मीर की सदियों पुरानी सहअस्तित्व की परंपरा कश्मीरियत, सूफीवाद और साझा सांस्कृतिक मूल्यों में निहित है। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को निरंतर अंतरधार्मिक संवाद के माध्यम से संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मानवता को हमेशा धार्मिक मतभेदों से ऊपर रखा जाना चाहिए।
श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में 'उर्दू, कश्मीरियत और साझा सांस्कृतिक परंपराएं' विषय पर आयोजित अंतरधार्मिक संवाद में सभा को संबोधित करते हुए कर्ण सिंह ने अंतरधार्मिक संवाद, उर्दू, कश्मीरियत और साझा सांस्कृतिक परंपराओं जैसे विषयों को एक मंच पर लाने के लिए आयोजकों को बधाई दी और इन्हें ऐसे विषय बताया जिन पर अलग-अलग कई दिनों तक चर्चा की जा सकती है।
अंतरधार्मिक संवाद के महत्व पर बोलते हुए सिंह ने 1893 में शिकागो में आयोजित ऐतिहासिक विश्व धर्म संसद को याद किया, जहां स्वामी विवेकानंद ने विश्व के समक्ष भारत के सार्वभौमिक स्वीकृति के संदेश को प्रस्तुत किया था।
उन्होंने कहा कि अंतरधार्मिक संवाद का उद्देश्य किसी एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करना नहीं है, बल्कि एक-दूसरे की मान्यताओं को समझना और यह स्वीकार करना है कि सभी धर्म अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।
ऋग्वेद के प्रसिद्ध श्लोक, 'एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति' (सत्य एक है, ज्ञानी लोग इसे अलग-अलग तरीकों से बताते हैं) का हवाला देते हुए सिंह ने आगे कहा कि सभी धर्म अलग-अलग मार्गों से एक ही सर्वशक्तिमान की पूजा करते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि ईश्वर एक है, तो विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग ईश्वर नहीं हो सकते। जिस प्रकार पर्वत की चोटी तक पहुंचने के अनेक मार्ग होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न धर्म भी एक ही गंतव्य की ओर ले जाते हैं।
कश्मीर की सभ्यतागत विरासत पर प्रकाश डालते हुए सिंह ने कहा कि घाटी में वैदिक परंपराओं, बौद्ध धर्म, शैव धर्म और बाद में सूफीवाद का विकास हुआ है। लाल डेड, मीर सैयद अली हमदानी और शेख नूरुद्दीन नूरानी (नंद ऋषि) जैसे संतों ने प्रेम, सहिष्णुता और सहअस्तित्व की संस्कृति को बढ़ावा दिया।
उन्होंने कहा कि कश्मीर में सूफीवाद इसलिए फला-फूला क्योंकि इसने प्रेम का संदेश फैलाया, न कि घृणा का। कोई भी धर्म घृणा के माध्यम से फल-फूल नहीं सकता; मानवता को हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए।
--आईएएनएस
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