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आरएसएस के मुद्दे पर कर्नाटक में सियासी घमासान, प्रियंक खड़गे बोले- प्रस्तावित विधेयक में संगठन का जिक्र तक नहीं

आरएसएस के मुद्दे पर कर्नाटक में सियासी घमासान, प्रियंक खड़गे बोले- प्रस्तावित विधेयक में संगठन का जिक्र तक नहीं
आरएसएस के मुद्दे पर कर्नाटक में सियासी घमासान, प्रियंक खड़गे बोले- प्रस्तावित विधेयक में संगठन का जिक्र तक नहीं

बेंगलुरु, 14 अगस्त (आईएएनएस)। कर्नाटक में सरकारी परिसरों और सार्वजनिक संपत्तियों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले प्रस्तावित विधेयक को लेकर सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। भाजपा के आरोपों पर पलटवार करते हुए राज्य के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने सवाल किया कि आखिर विधेयक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का जिक्र कहां है।

खड़गे ने शुक्रवार को बेंगलुरु में पत्रकारों से कहा, "क्या उन्होंने विधेयक पढ़ा है? अगर पढ़ा है तो उन्हें बताना चाहिए कि उनकी आपत्ति क्या है। विधेयक सदन में पेश होने दीजिए और उस पर बहस होने दीजिए।"

प्रस्तावित कर्नाटक रेगुलेशन ऑफ यूज ऑफ गवर्नमेंट प्रिमाइसेज एंड पब्लिक प्रॉपर्टी बिल, 2026 को लेकर भाजपा आरोप लगा रही है कि राज्य सरकार इसका इस्तेमाल आरएसएस और अन्य संगठनों की सार्वजनिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहती है। हालांकि, सरकार का कहना है कि विधेयक का उद्देश्य किसी विशेष संगठन को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सरकारी जमीन, भवनों और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों के अनधिकृत इस्तेमाल को रोकना है।

प्रस्तावित कानून के तहत सरकारी परिसर या सार्वजनिक संपत्ति के अनधिकृत इस्तेमाल पर पहली बार दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल और/या पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरी या बाद की बार अपराध करने पर पांच साल तक की जेल और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना प्रस्तावित है।

विधेयक में सरकारी जमीन, भवन, सड़क, पार्क, खेल मैदान, जल निकाय और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने का प्रावधान है। इसमें निजी व्यक्तियों के साथ-साथ संगठनों, संघों और सोसाइटियों द्वारा ऐसी संपत्तियों के अनधिकृत इस्तेमाल को भी शामिल किया गया है। इसे अतिक्रमण माना जा सकता है और दोषसिद्धि के बाद भी उल्लंघन जारी रहने पर प्रतिदिन 5,000 रुपये तक का अतिरिक्त जुर्माना लगाया जा सकता है।

प्रियंक खड़गे ने भाजपा के इस आरोप को खारिज किया कि विधेयक आरएसएस को ध्यान में रखकर लाया गया है। उन्होंने कहा, "इस विधेयक और आपके अपंजीकृत एवं अनियंत्रित संगठन का कोई संबंध नहीं है।"

उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जान से मारने की धमकी मिली है और सवाल उठाया कि भाजपा नेता उन्हें निशाना क्यों बना रहे हैं। खड़गे ने कहा, "मीडिया तय करे कि मैं उन्हें निशाना बना रहा हूं या मैं उनका निशाना बन गया हूं।"

वहीं, श्रम, रोजगार एवं प्रशिक्षण मंत्री संतोष लाड ने भी आरएसएस को लेकर सरकार पर लगाए जा रहे आरोपों को खारिज किया। उन्होंने सवाल किया कि मीडिया विधेयक को आरएसएस को निशाना बनाने वाला कानून क्यों बता रहा है।

लाड ने कहा, "प्रस्तावित विधेयक में आरएसएस का कोई उल्लेख नहीं है। हम सार्वजनिक संपत्ति के इस्तेमाल के लिए कुछ मानदंड और शर्तें तय करने वाला विधेयक ला रहे हैं। इसमें आरएसएस का मुद्दा लाना गलत है।"

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी स्पष्ट किया कि सरकारी परिसरों या सार्वजनिक संपत्तियों पर गतिविधियां आयोजित करने वाले सभी संगठनों और समूहों को अनुमति लेनी होगी। उन्होंने कहा, "जो भी गतिविधियां आयोजित करेगा, उसे अनुमति लेनी होगी। इसमें किसी पार्टी या संगठन की बात नहीं है।"

हालांकि, भाजपा ने सरकार के खिलाफ अपना हमला जारी रखा है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने आरोप लगाया कि प्रियंक खड़गे ने अपने "अहंकार" को संतुष्ट करने के लिए यह विधेयक लाया है।

अशोक ने कहा कि आरएसएस ने प्रियंक खड़गे जैसे कई लोगों को देखा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के पास अब करीब डेढ़ साल का कार्यकाल बचा है, लेकिन अच्छे काम करने के बजाय वह ऐसे मुद्दों में उलझी हुई है।

विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष चलवाड़ी नारायणस्वामी ने भी आरोप लगाया कि विधेयक आरएसएस को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा कि कानून सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए, लेकिन किसी संगठन के खिलाफ प्रचार कर राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश गलत है।

पूर्व गृह मंत्री और भाजपा विधायक अरागा ज्ञानेंद्र ने आरोप लगाया कि सरकार आरएसएस के प्रति पूर्वाग्रह के कारण यह कानून ला रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा विधेयक का विरोध करेगी।

भाजपा विधायक वी. सुनील कुमार ने भी प्रियंक खड़गे पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि गृह मंत्री को आरएसएस को लेकर "फोबिया" है। उन्होंने कहा कि आरएसएस का उल्लेख किए बिना भी प्रियंक खड़गे को लगता है कि वह प्रासंगिक नहीं रहेंगे।

इस तरह प्रस्तावित विधेयक को लेकर कर्नाटक की राजनीति में आरएसएस का मुद्दा केंद्र में आ गया है। सरकार जहां इसे सार्वजनिक संपत्तियों के अनधिकृत इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला सामान्य कानून बता रही है, वहीं भाजपा इसे आरएसएस और अन्य संगठनों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश के तौर पर पेश कर रही है।

--आईएएनएस

डीएससी

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