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जामिया में महिला फैकल्टी के लिए अलग टॉयलेट होगा, आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने किया अवमानना याचिका का निपटारा

जामिया में महिला फैकल्टी के लिए अलग टॉयलेट होगा, आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने किया अवमानना याचिका का निपटारा
जामिया में महिला फैकल्टी के लिए अलग टॉयलेट होगा, आश्वासन के बाद हाईकोर्ट ने किया अवमानना याचिका का निपटारा

नई दिल्ली, 8 सितंबर (आईएएनएस)। दिल्ली हाईकोर्ट ने जामिया मिलिया इस्लामिया के एक सीनियर प्रोफेसर की ओर से दायर अवमानना ​​याचिका का निपटारा कर दिया है। यूनिवर्सिटी ने भरोसा दिलाया है कि संस्थान में महिला फैकल्टी सदस्यों (जिनमें दिव्यांग महिलाएं भी शामिल हैं) के लिए अलग से टॉयलेट तय किए जाएंगे।

जस्टिस मिनी पुष्करणा की सिंगल जज बेंच ने यूनिवर्सिटी के इस बयान पर ध्यान दिया कि बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर एक टॉयलेट सिर्फ महिला फैकल्टी सदस्यों और दिव्यांग महिलाओं के लिए तय किया जाएगा, जबकि दिव्यांग पुरुषों के लिए अलग इंतजाम किए जाएंगे।

दिल्ली हाईकोर्ट प्रोफेसर सुजाता ऐश्वर्या की ओर से दायर अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि यूनिवर्सिटी में साफ-सुथरी और ठीक-ठाक टॉयलेट सुविधा तक पहुंचने की उनकी शिकायत के संबंध में मार्च में जारी न्यायिक निर्देशों का पालन नहीं किया गया।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर मौजूद एक टॉयलेट महिला फैकल्टी सदस्यों और दिव्यांगों के लिए तय किया गया था, लेकिन उसका इस्तेमाल पुरुष और महिला दोनों कर रहे थे। वकील मृण्मय चटर्जी ने कहा कि यह सुविधा सिर्फ महिलाओं के लिए ही आरक्षित होनी चाहिए।

जामिया मिलिया इस्लामिया की ओर से पेश वकील ने निर्देश मिलने पर कहा कि दूसरी मंजिल का टॉयलेट सिर्फ महिला फैकल्टी सदस्यों और दिव्यांग महिलाओं के लिए तय किया जाएगा। पिछले हफ्ते जारी आदेश में जस्टिस पुष्करणा ने कहा, "इस बयान पर ध्यान दिया गया है।"

आदेश में यूनिवर्सिटी के इस आश्वासन का भी जिक्र किया गया कि यह सुविधा एक हफ्ते के अंदर उपलब्ध करा दी जाएगी और दिव्यांग पुरुषों के लिए अलग से इंतजाम किए जाएंगे।

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि महिला फैकल्टी सदस्यों के लिए तय किया गया खास टॉयलेट सभी महिला फैकल्टी सदस्यों के लिए उपलब्ध होगा और "किसी भी व्यक्ति को उस टॉयलेट पर ताला लगाने की इजाजत नहीं होगी"।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अवमानना ​​की कार्यवाही का निपटारा करते हुए कहा, "ऊपर बताई गई बातों को देखते हुए इस याचिका में अब और कोई आदेश जारी करने की जरूरत नहीं है।"

यह विवाद जामिया के 'सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज' में एक रेस्टरूम को लेकर प्रोफेसर ऐश्वर्या की शिकायत से शुरू हुआ था। उन्होंने साफ-सफाई की चिंताओं और एक मेडिकल समस्या का हवाला देते हुए एक अलग रेस्टरूम को महिलाओं के टॉयलेट के तौर पर तय करने की मांग की थी। उस मेडिकल समस्या की वजह से कुछ सुविधाओं का इस्तेमाल करना उनके लिए मुश्किल था।

13 मार्च को दिए गए अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा था कि यह मामला काम की जगह से जुड़ी एक शिकायत का था, जिसे यूनिवर्सिटी के "प्रशासनिक दायरे से बाहर नहीं जाना चाहिए था"; इसमें एक महिला की साफ-सफाई और अपनी मेडिकल तकलीफ के आधार पर रेस्टरूम की सुविधा की मांग शामिल थी।

ऑर्डर में यह दर्ज किया गया था कि दो दशकों से ज्यादा समय से सेवा दे रहे सीनियर प्रोफेसर, प्रोफेसर ऐश्वर्या, 'सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज' में एक रेस्टरूम का इस्तेमाल करते थे। लेकिन, बाद में उस सुविधा के इस्तेमाल पर नियम लागू कर दिए गए और जब उसे आम इस्तेमाल के लिए खोला गया तो आरोप है कि वहां साफ-सफाई की हालत खराब हो गई।

उन्होंने एक अलग बने हुए रेस्टरूम को महिलाओं के टॉयलेट के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी थी। उन्होंने बताया कि उसमें वेस्टर्न-स्टाइल कमोड लगा था और घुटने की तकलीफ की वजह से, जिससे उकड़ू बैठना मुश्किल होता था, यह उनके लिए जरूरी था। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी, जिसमें कारण बताओ नोटिस जारी करना, एक कमेटी बनाना और लिखित माफीनामा जमा करने का आदेश देना शामिल था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने उन कार्रवाइयों को रद्द करते हुए कहा था कि यूनिवर्सिटी का जवाब ऐसा लगता है जैसे उसने संस्थागत अनुशासन और साफ-सफाई व सम्मान से जुड़ी शिकायत के समाधान के बीच के फर्क को नजरअंदाज कर दिया हो।

जस्टिस संजीव नरूला ने कहा था, "इस तरह की शिकायत पर बातचीत की जरूरत थी, न कि मामले को बढ़ाने की।"

हाईकोर्ट ने कहा था कि साफ-सुथरी इस्तेमाल के लायक टॉयलेट सुविधाएं काम की बुनियादी शर्तों का हिस्सा हैं। कोर्ट ने जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन को निर्देश दिया कि वे प्रोफेसर ऐश्वर्या की शिकायत पर सफाई, निजता, सम्मान और उनकी बताई गई मेडिकल स्थिति को ध्यान में रखते हुए और संवेदनशीलता के साथ दोबारा विचार करें।

इसके बाद यूनिवर्सिटी ने 13 मार्च के आदेश की समीक्षा के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। उन्होंने तर्क दिया कि वहां साफ-सफाई की पर्याप्त सुविधाएं मौजूद थीं और सुधार के लिए जरूरी कदम पहले ही उठाए जा चुके थे। जस्टिस नरूला ने 15 अप्रैल को समीक्षा याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी रिकॉर्ड में ऐसी कोई स्पष्ट गलती नहीं दिखा पाई, जिसके आधार पर समीक्षा की जा सके।

--आईएएनएस

एसएचके/वीसी

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