दानम नागेंद्र ने तेलंगाना हाईकोर्ट के अयोग्यता आदेश के खिलाफ किया सुप्रीम कोर्ट का रुख
नई दिल्ली, 21 सितंबर (आईएएनएस)। तेलंगाना के पूर्व विधायक दानम नागेंद्र ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत उन्हें दलबदल विरोधी कानून के तहत विधानसभा सदस्य के तौर पर अयोग्य ठहराया गया था।
वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के सामने यह मामला उठाया और तुरंत सुनवाई की मांग की। अनुरोध सुनने के बाद सीजेआई ने बुधवार को नागेंद्र की स्पेशल लीव पिटिशन (एसएलपी) को लिस्ट करने पर सहमति जताई।
नागेंद्र ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष गड्डम प्रसाद कुमार के उस आदेश को रद्द कर दिया गया था, जिसके तहत उनकी अयोग्यता की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था। साथ ही, उन्हें 23 अप्रैल 2024 से विधायक के तौर पर अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
18 सितंबर को दिए गए एक फैसले में मुख्य न्यायाधीश अपारेश कुमार सिंह और जस्टिस जीएम मोहिउद्दीन की डिवीजन बेंच ने माना कि नागेंद्र संविधान के अनुच्छेद 191(2) के साथ पढ़े जाने वाले दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(ए) के तहत अयोग्य हो गए थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बीआरएस विधायक चुने जाने के बावजूद उन्होंने सिकंदराबाद निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ा था।
तेलंगाना हाईकोर्ट ने खैरताबाद विधानसभा सीट को भी खाली घोषित कर दिया और निर्देश दिया कि उसके आदेश की एक कॉपी तेलंगाना विधानसभा के सचिव और भारत निर्वाचन आयोग को भेजी जाए।
यह फैसला भाजपा विधायक दल के नेता एलेटी महेश्वर रेड्डी और बीआरएस विधायक पाडी कौशिक रेड्डी द्वारा दायर याचिकाओं पर आया, जिसमें स्पीकर के 11 मार्च 2026 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत अयोग्यता याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट के फैसले में दर्ज किया गया कि नागेंद्र दिसंबर 2023 में खैरताबाद से बीआरएस विधायक चुने गए थे और बाद में 23 अप्रैल 2024 को सिकंदराबाद लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर अपना नामांकन दाखिल किया था, जहां उन्होंने बीआरएस उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार किया था।
हाईकोर्ट ने माना कि अयोग्यता की कार्यवाही लंबे समय तक लंबित रहने का मतलब है कि मामले को नए फैसले के लिए स्पीकर के पास वापस भेजने की जरूरत नहीं है।
अदालत ने कहा कि मौजूदा मामला ऐसा है जिसमें अयोग्यता की कार्यवाही डेढ़ साल से ज्यादा समय से चल रही है और अब तक विधानसभा का लगभग तीन साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि नागेंद्र 2024 से तेलंगाना विधानसभा के सदस्य के तौर पर अयोग्य हो गए हैं क्योंकि उन्होंने बीआरएस सदस्य होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव लड़ा था।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि नागेंद्र के बाद के व्यवहार या बीआरएस द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई न करने से उनकी अयोग्यता खत्म हो सकती है।
कोर्ट ने कहा कि"संबंधित पार्टी की चुप्पी या उसकी ओर से आंतरिक अनुशासनात्मक कार्रवाई न होना और सदस्य का बाद का व्यवहार, नागेंद्र की उस अयोग्यता को खत्म नहीं करेगा जो उन्हें बीआरएस विधायक चुने जाने के बावजूद 2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर लड़ने की वजह से हुई थी।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि स्पीकर ने कानून को गलत समझा था; उन्होंने सदन के बाहर के व्यवहार को दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(ए) के तहत अपनी शक्तियों के दायरे से बाहर माना था।
हाईकोर्ट ने कहा कि दसवीं अनुसूची का मकसद पद के लालच या ऐसी ही दूसरी वजहों से प्रेरित राजनीतिक दल-बदल की बुराई को रोकना है, जो हमारे लोकतंत्र की नींव को खतरे में डालती हैं।
--आईएएनएस
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