वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सजा पर पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था घेरे में, बीवाईसी ने उठाए सवाल
क्वेटा, 30 अक्टूबर (आईएएनएस)। एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन ने पाकिस्तान में मानवाधिकार वकील इमान जैनब मजारी-हाजिर और उनके पति हादी अली चट्ठा को सुरक्षा उल्लंघन से जुड़े एक मामले में 10-10 वर्ष की सजा सुनाए जाने की कड़ी निंदा की है। संगठन ने इसे पाकिस्तान की न्यायपालिका की बेबसी, न्याय के अभाव और सैन्य वर्चस्व पर आधारित व्यवस्था का स्पष्ट उदाहरण बताया है।
बलोच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) ने कहा कि दंपति को 10-10 वर्ष की जेल की सजा देना मानवाधिकारों और न्याय की रक्षा के लिए चल रहे संघर्ष को दबाने का प्रयास है।
संगठन ने कहा कि इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा केवल वकील ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं। उन्होंने हमेशा बलोच, पश्तून और अन्य उत्पीड़ित समुदायों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई है और न्याय की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई है।
सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी बयान में बीवाईसी ने कहा, "इमान जैनब मजारी और हादी अली चट्ठा को 10-10 वर्ष की सजा पाकिस्तान की न्यायपालिका की बेबसी, न्याय के अभाव और सैन्य प्रभाव वाली व्यवस्था की हकीकत को दर्शाती है। जो लोग एक दमनकारी व्यवस्था में दूसरों को न्याय दिलाने और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए दिन-रात संघर्ष करते हैं, अंततः वही खुद अदालत में खड़े होकर राज्य की ओर से किए गए अन्याय का सामना करने के लिए मजबूर हो जाते हैं।"
संगठन ने कहा कि इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा ने हमेशा उन परिवारों का साथ दिया, जो जबरन गुमशुदगी सहित राज्य के कथित दमन से प्रभावित रहे हैं, लेकिन आज वही दंपति उस व्यवस्था के तहत अन्याय का सामना कर रहा है, जिसके खिलाफ वे पीड़ितों के अधिकारों की आवाज उठाते रहे हैं।
गुरुवार को इस्लामाबाद की एक आतंकवाद निरोधी अदालत ने वर्ष 2024 में एक क्रिकेट मैच के दौरान सड़क पर लगाए गए बैरिकेड हटाने से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा को 10-10 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के बाद न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
अदालत ने दोनों पर आतंकवाद निरोधक अधिनियम (एटीए), 1997 के तहत एक-एक लाख पाकिस्तानी रुपए का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने आदेश दिया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी, जिससे दोनों की कुल जेल अवधि 10 वर्ष रहेगी।
बीवाईसी ने कहा, "सवाल यह है कि क्या न्याय के लिए आवाज उठाना अपराध है? क्या उत्पीड़ित समुदायों के साथ खड़ा होना दंडनीय है? क्या मानवाधिकारों की रक्षा करने वालों को केवल इसलिए चुप कराने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि वे राज्य के कथित दमन के खिलाफ बोलते हैं? इमान जैनब मजारी और हादी अली चट्ठा को सुनाई गई सजा केवल दो व्यक्तियों की सजा नहीं है, बल्कि उन सभी आवाजों के लिए एक चेतावनी है जो पीड़ितों के पक्ष में बोलती हैं और अन्याय का विरोध करती हैं।"
संगठन ने कहा कि जब वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगें तो पूरी न्याय व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बीवाईसी ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जेल की सजा देकर सच्चाई को समाप्त नहीं किया जा सकता। जेल की ऊंची दीवारें किसी आवाज को कुछ समय के लिए सीमित कर सकती हैं, लेकिन न्याय और अधिकारों के लिए उठी आवाजों को हमेशा के लिए खामोश नहीं कर सकतीं।
संगठन ने कहा कि यह मामला न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोगों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि क्या इस देश में उत्पीड़ित लोगों के लिए आवाज उठाने की वास्तविक स्वतंत्रता मौजूद है।
बीवाईसी ने मानवाधिकार संगठनों, वकीलों के प्रतिनिधि निकायों, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से इस मामले का संज्ञान लेने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठाने की अपील की।
--आईएएनएस
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