भारत ने अमेरिका और चीन के साथ आर्थिक साझेदारी में संतुलन बनाया
नई दिल्ली, 30 अगस्त (आईएएनएस)। भारत ने 2026 के दौरान अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपनी आर्थिक साझेदारी में संतुलन बनाने में सफलता हासिल की है। भारत ने 2025 में वॉशिंगटन के साथ बढ़े टैरिफ विवाद का बातचीत के जरिए समाधान किया है और 2020 के सीमा संघर्षों के बाद पहली बार चीनी पूंजी पर लगाए गए प्रतिबंधों में नियंत्रित तरीके से ढील दी है। यह जानकारी एक आर्टिकल में दी गई।
आर्टिकल के मुताबिक, 2 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फोन पर बातचीत के दौरान भारतीय वस्तुओं पर पारस्परिक टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति जताई। साथ ही, रूसी तेल की खरीद से जुड़ा अतिरिक्त 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क भी पूरी तरह हटा दिया गया।
दोनों सरकारों ने सार्वजनिक रूप से दोहराया है कि टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारत के साथ हुए इस समझौते पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
इसके बाद अमेरिका ने अलग से धारा 301 के तहत 10 प्रतिशत की ड्यूटी भी लगाई है। हालांकि, भारत के करीब 45 प्रतिशत निर्यात इसके दायरे से बाहर हैं। वहीं, क्वार्ट्ज सरफेस उत्पादों पर सेफगार्ड टैरिफ बढ़कर 55 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
जियोपॉलिटिकल मॉनिटर में आलोक कुमार कनोजिया के लेख के अनुसार, कुल मिलाकर टैरिफ व्यवस्था एक साल पहले की तुलना में अब कम और अधिक पूर्वानुमान योग्य है।
दूसरी तरफ, 10 मार्च को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रेस नोट 3 में संशोधन किया। यह 2020 का वह नियम था, जिसके तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले सभी निवेश को अनिवार्य सरकारी मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।
हालांकि, इस संशोधन से चीन से प्रत्यक्ष निवेश का रास्ता पूरी तरह नहीं खोला गया है। इसके लिए अभी भी पहले से सरकारी मंजूरी जरूरी है।
लेकिन नए नियमों के तहत ऐसी कंपनियों के लिए ऑटोमैटिक रूट बनाया गया है, जिनमें चीनी लाभकारी स्वामित्व 10 प्रतिशत से कम और गैर-नियंत्रणकारी है। इसके अलावा, पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और पॉलीसिलिकॉन तथा इंगट-वेफर जैसे सौर ऊर्जा से जुड़े इनपुट सहित चुनिंदा विनिर्माण क्षेत्रों के लिए 60 दिनों की मंजूरी समयसीमा तय की गई है।
सरकार ने अगस्त के अंत तक बताया कि आसान नियमों के तहत 29 परियोजनाओं में करीब 4,896 करोड़ रुपए का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया है। ये निवेश आईटी, फार्मास्युटिकल्स, डेटा सेंटर और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में हुआ है।
यह चीन के लिए पूरी तरह से दरवाजा खोलने के बजाय एक सीमित रास्ता है। हालांकि, इसके साथ ही चीन ने पिछले साल अगस्त में दुर्लभ मृदा चुंबक उर्वरकों और टनल बोरिंग मशीनों पर लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों में ढील दी थी।
2026 के दौरान भारत और चीन के बीच सीमा वार्ता में भी तेजी आई है। इसका ताजा उदाहरण इस सप्ताह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा है। यह पांच वर्षों में सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों के बीच पहली वार्ता के लिए हुई यात्रा थी। यह यात्रा अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले हुई है।
आर्टिकल के अनुसार, अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौता और चीन की ओर सावधानीपूर्वक खुलना, दोनों घटनाओं को अलग-अलग देखा जाए तो ये दो अलग कूटनीतिक कहानियां लगती हैं।
लेकिन इन्हें एक साथ देखने पर तस्वीर यह बनती है कि भारत अपनी पूंजी और मांग के लिए अपनी निर्भरता को अलग-अलग स्रोतों में बांटने की कोशिश कर रहा है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब भारत की आर्थिक वृद्धि के अनुमानों में गिरावट की जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र के मध्य-वर्ष के आर्थिक परिदृश्य में 2026 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान 6.6 प्रतिशत रखा गया है, जो पिछले साल के अनुमानित 7.4 प्रतिशत से कम है। रिपोर्ट में भू-राजनीतिक तनाव और नीतिगत अनिश्चितता को वैश्विक माहौल के लिए चुनौती बताया गया है।
वहीं, एसएंडपी ने इस साल की शुरुआत में अधिक आशावादी अनुमान लगाया था। उसने स्थिर निर्यात और निवेश चक्र में सुधार के आधार पर वित्त वर्ष 2027 में भारत की आर्थिक वृद्धि 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था।
दोनों अनुमान इस बात पर निर्भर करते हैं कि भारत विदेशी पूंजी को आकर्षित करना जारी रखता है, जो उसके बाहरी खाते को स्थिर रखने में मदद करती है।
--आईएएनएस
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