त्रिपुरा में सदियों पुरानी 'खारची पूजा' शुरू, इस बार थीम 'एक पेड़, मां के नाम'
अगरतला, 22 जुलाई (आईएएनएस)। त्रिपुरा की सदियों पुरानी परंपराओं, भव्य धार्मिक अनुष्ठानों और रंगारंग आयोजनों के बीच ऐतिहासिक खारची पूजा बुधवार से शुरू हो गई। यह पूजा राज्य की पूर्व रियासत त्रिपुरा की पुरानी राजधानी पुरान हवेली (वर्तमान खयरपुर) में आयोजित की जा रही है, जो अगरतला से लगभग 8 किलोमीटर उत्तर में स्थित है।
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने अन्य गणमान्य लोगों के साथ सात दिवसीय मेले और खारची पूजा का उद्घाटन किया। इस दौरान राज्य के सबसे श्रद्धेय और अनोखे धार्मिक आयोजनों में से एक में 14 देवताओं की एक साथ पूजा की जाती है।
देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के इस सप्ताहभर चलने वाले मेले और सदियों पुराने उत्सव में शामिल होने की उम्मीद है। यह आयोजन पारंपरिक रीति-रिवाजों, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच शुरू हुआ।
मान्यता है कि खारची पूजा और उससे जुड़ा मेला मनुष्यों के पापों के शुद्धिकरण का प्रतीक है। खारची पूजा एवं मेला समिति के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री रतन चक्रवर्ती ने कहा कि हर साल देशभर से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इस अनोखे उत्सव में शामिल होते हैं।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चक्रवर्ती ने उम्मीद जताई कि यदि मौसम अनुकूल रहा तो इस बार श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्ष से अधिक होगी।
उन्होंने बताया कि हरित त्रिपुरा के निर्माण के उद्देश्य से इस वर्ष खारची उत्सव की थीम 'एक पेड़, मां के नाम' रखी गई है। इसके तहत सात दिनों तक चलने वाले मेले में आने वाले लोगों को सरकारी पहल के तहत विभिन्न प्रजातियों के पौधे निःशुल्क वितरित किए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि पड़ोसी देश बांग्लादेश की मौजूदा परिस्थितियों के कारण इस बार सीमा पार से आने वाले आगंतुकों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कम रह सकती है।
मूल रूप से यह उत्सव त्रिपुरा की आदिवासी त्रिपुरी समुदाय की परंपरा से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ यह सभी समुदायों और धर्मों के लोगों का उत्सव बन गया है। यह त्रिपुरा की सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक समावेशिता की परंपरा को दर्शाता है।
पूरे आयोजन के दौरान रंग-बिरंगे पंडाल, आकर्षक रोशनी, धार्मिक अनुष्ठान, वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक ढोल की धुनों से माहौल भक्तिमय बना रहता है।
खारची पूजा में कुल 14 देवताओं की पूजा की जाती है। इनमें शिव, दुर्गा, विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय, गणेश, ब्रह्मा, अबधी (जल देवता), चंद्र, गंगा, अग्नि, कामदेव और हिमाद्रि (हिमालय) शामिल हैं।
इस पूजा की एक विशेष परंपरा पशु बलि भी है, जिसे श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
खारची पूजा की सबसे अनोखी बात यह है कि मंदिर में स्थापित 14 देवताओं की मूर्तियां पूर्ण आकार में नहीं हैं, बल्कि केवल उनके पवित्र सिर (मस्तक) की पूजा की जाती है। यही विशेषता इसे अन्य हिंदू परंपराओं से अलग बनाती है।
सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, उत्सव की शुरुआत एक भव्य शोभायात्रा से होती है। इसमें देवताओं की प्रतिमाओं को विशेष जुलूस के साथ बाहर निकाला जाता है और त्रिपुरा पुलिस बैंड भी इसमें शामिल होता है।
देवताओं और पुजारियों के साथ त्रिपुरा पुलिस के जवान चलते हैं। पुलिस द्वारा मुख्य राजपुरोहित को औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया जाता है, जो इस उत्सव की शाही विरासत को दर्शाता है।
15 अक्टूबर 1949 को तत्कालीन रीजेंट महारानी कंचन प्रभा देवी और भारत के गवर्नर जनरल के बीच हुए विलय समझौते के बाद त्रिपुरा भारत सरकार के प्रशासन के अधीन आया था।
इस समझौते में यह व्यवस्था की गई थी कि त्रिपुरा सरकार 14 मंदिरों और उनसे जुड़े धार्मिक आयोजनों, जिनमें खारची पूजा और माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर (देश के 51 शक्तिपीठों में से एक) शामिल हैं, को संरक्षण और आर्थिक सहायता देती रहेगी।
इसी कारण त्रिपुरा सरकार पिछले कई दशकों से खारची पूजा और उससे जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों का खर्च वहन कर रही है।
करीब 78 वर्षों तक, 1838 तक, पुरान हवेली त्रिपुरा राज्य की राजधानी रही। उस समय त्रिपुरा राज्य का क्षेत्र वर्तमान बांग्लादेश के सिलहट, ब्राह्मणबाड़िया और कोमिल्ला जिलों के बड़े हिस्सों तक फैला हुआ था।
राजा कृष्ण माणिक्य बहादुर (1760-1783) ने 1760 में राजधानी को उदयपुर से पुरान हवेली स्थानांतरित किया था। उनके शासनकाल में निर्मित 14 देवताओं का मंदिर आज भी त्रिपुरा की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बना हुआ है।
बाद में 1838 में राजा कृष्ण किशोर माणिक्य बहादुर (1830-1849) ने राजधानी को पुरान हवेली से अगरतला स्थानांतरित कर दिया, जो आज भी राज्य की राजधानी है।
खारची पूजा के अवसर पर त्रिपुरा के राज्यपाल इंद्र सेना रेड्डी नल्लू और मुख्यमंत्री माणिक साहा ने राज्यवासियों को शुभकामनाएं दीं।
राज्यपाल ने अपने संदेश में कहा कि खारची पूजा त्रिपुरा के सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है और यह लोगों के जीवन में खुशी, प्रेम, शांति, समृद्धि और भाईचारे की भावना लेकर आए।
मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा कि यह पारंपरिक उत्सव पीढ़ियों से सांप्रदायिक सौहार्द, सद्भावना, एकता और सामाजिक समरसता का प्रतीक रहा है। उन्होंने कहा कि त्रिपुरा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को दर्शाने वाला यह उत्सव पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जाति, जनजाति, धर्म और पंथ से ऊपर उठकर सभी समुदायों की भागीदारी ने खारची उत्सव को सामाजिक एकता, सांस्कृतिक सह-अस्तित्व और सार्वभौमिक सद्भाव का महोत्सव बना दिया है।
--आईएएनएस
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